• नवीनतम समाचार
  • पहल - 109

    दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है। इसका प्रयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।
    हरिशंकर परसाई

  • पहल परिचय

    "पहल का प्रकाशन मुख्य रूप से लेखकों - बुद्धिजीविओं के लिए नहीं बल्कि पाठकों की उस बड़ी संख्या के लिए हुआ है जो एक खास तरह की भूमिका के लिए तैयार होने को है। हमारा उद्येश्य क्रन्तिकारी चेतना की व्यापक शिक्षा का है ." इस सुस्पष्ट लक्ष्य के साथ पहले - पहल "पहल" का प्रकाशन 1973 के उत्तरार्ध में हुआ। जो बहुत जल्द ही अग्रिम पंक्ति की पत्रिका बन गई। लगभग चार दशकों से हिंदी साहित्य की साहित्यिक पत्रिकाओं के संसार में "पहल" का नाम महत्वपूर्ण बना हुआ है। इस लम्बे यात्रा काल में "पहल" ने अपने इतिहास में कई अनुभव दर्ज किये। प्रारंभिक दौर में ही इसके तीखे तेवरों से तिलमिलाकर "पहल" पर चौतरफा हमले किये गए, यहाँ तक की इस पर प्रतिबन्ध लगाने और संपादक को गिरफ्तार करने की मांग भी की गई। तत्कालीन नवोदित लेखकों, बुद्धिजीविओं और लघुपत्रिकाओं का इसे निर्बाध लिखित समर्थन मिलता रहा। इतिहास का निर्णय आज सामने है। Read More...

Login