खेल ख़त्म हुआ

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    दिसम्बर 2013
श्रेणी लम्बी कहानी/फारसी
संस्करण दिसम्बर 2013
लेखक का नाम ग़ुलाम हुसैन सा'एदी \ अनुवाद : अजमल कमाल







1.

हसनी ने खुद मुझसे कहा था कि रात को उसके झोंपड़े में चलेंगे। मैं उसके यहाँ कभी नहीं जाता था, न वह कभी हमारे यहाँ आता था। मैं अपने बाबा के डर से उसे नहीं बुलाता था, और वह अपने बाबा के डर से मुझे। वह भी अपने बाबा से बहुत डरता था, बल्कि मुझसे भी ज़्यादा डरता था। मगर वह रात दूसरी रातों की तरह नहीं थी। मैं जाने से इन्कार नहीं कर सकता था। हसनी मुझसे नाराज़ हो जाता, रंजीदा होता, समझता कि मैं उसका दोस्त नहीं रहा। बस इसी तरह मैं चला गया। मैंने पहली बार उसके झोंपड़े में कदम रखा। हम एक दूसरे से हमेशा घर के बाहर मिलते थे। सुबह को मैं उसके झोंपड़े के बाहर पहुंच कर ज़ोर से सीटी बजाता — ये खुश-आवाज़ सीटी बजाना उसी ने मुझे सिखाया था - और इस तरह सीटी बजा कर मैं उसे पैगाम देता कि हसनी, आ जाओ, काम का वक्त हो गया। हसनी अपनी बाल्टी उठाकर बाहर निकल आता। एक दूसरे को सलाम करने के बजाए हम दोनों मुक्काबाज़ी करते थे। खूब ज़ोर के मुक्के लगाते जिन से दर्द होता था। हमारा यही तरीका था। एक दूसरे से मिलते या रुखसत होते हुए मुक्केबाज़ी होती। सिवाए उस वक्त के जब एक दूसरे से नाराज़ हों या किसी बात पर लड़ाई हो चुकी हो। फिर हम साथ चल पड़ते और झुग्गीयों झोंपड़ों में से गुज़रकर मुरदे नहलाने वाले मकान के पास के गढ़े पर पहुंचते। शहरदारी (नगरपालिका) के कूड़ा उठाने वाले ट्रक अपना कूड़ा यहीं फेंकते थे। एक रोज़ मैं टीन-डिब्बे जमा करता और हसनी कांच के टुकड़े, दूसरे दिन एक टीन-डिब्बे चुनता और मैं कांच के टुकड़े। कभी-कभार हमें कोई बेहतर चीज़ भी हाथ आ जाती - वनस्पती घी का खाली कनस्तर, बच्चे की चूसनी, टूटी हुई गुडिय़ा, कारआमद जूता, या सालिम शकरदान जिसके सिर्फ दस्ते पर बाल पड़ा होता, या प्लास्टिक का लोटा। एक बार तो मुझे ''व-इन्नो यकाद...'' का तावीज़ (अरबी ज़बान की एक दुआ के शब्द जो कुच्छ तावीज़ों पर लिखे जाते हैं) हाथ आ गया था, और एक बार हसनी को बिदेसी सिगरेट का पूरा भरा हुआ डिब्बा। जब हम थक जाते तो कूड़े के गढ़े के दूसरी तरफ, बड़े से मैदान से गुज़र कर, हाजी तैमूर के ईंटों के पुराने भट्टे पर पहुंच जाते जो बंद पड़ा था और अब यूं ही खुदा के नाम पर छोड़ दिया गया था। मैदान में इधर-उधर हर चंद कदम पर गहरे कुंए खुदे हुए थे। और दो चार नहीं, एक-दूसरे की बगल में कुंए ही कुंए थे। एक बार हम दोनों ने इरादा किया कि इन कुंओं को गिनते हैं, मगर पचास तक पहुंच कर हमारी हिम्मत टूट गई और हमने गिनना छोड़े दिया। कुंओं के पास पहुंच कर हम खूब मज़े से खेलते। वहां सो जाते या उल्टे लेट कर सीने तक कुंए में लटक जाते और अजीब-ओ-गरीब आवाज़ें निकालते। आवाज़ें कुंए में घूमती हुई वापिस आतीं। हर कुँआं एक खास तरह की आवाज़ निकाल कर हमें जवाब देता था। ज़्यादातर हम कुंए में मुँह डाल कर कहकहें लगाते और जवाब में हमें रोने की आवाज़ें सुनाई देतीं। तब हम डर जाते। फिर हंसते, ज़्यादा देर तक और ज़्यादा ज़ोर से हंसते, और कुंए से आती रोने की आवाज़ें भी बढ़ती जातीं, ऊंची होती जातीं। मैं और हसनी वहां ज़्यादातर वक्त अकेले होते। दूसरे बच्चे कूड़े के गढ़े की तर$फ कम जाते थे। उनकी अम्माएं उन्हें आने नहीं देती थीं। डरती थीं कि कहीं कुएं में न गिर पड़ें या कोई और बला उनके सर न आ जाये। लेकिन मैं और हसनी बड़े हो गए थे और रोज़ भरी हुई जेब लेकर घर लौटते थे, इसलिए हमारी अम्माएँ हम से कोई वास्ता न रखती थीं और हमें कुछ नहीं कहतीं थीं।
उस दिन - यानी जिस रात मैं हसनी से घर गया था उस दिन - सहपहर (तीसरे पहर) को हसनी बहुत गमगीन और गुस्से की हालत में बाहर आया। उसकी त्योरियां चढ़ी हुई थीं, आँखों से लगता था, बहुत रोया है। उसमें काम करने का हौसला न था। मुर्दे नहलाने वाले मकान के बाहर बने गढ़े के पास पहुंच कर वह बिलकुल खोया हुआ इधर-उधर भटकता और कूड़े के ढेर को लाठी से कुरेदता रहा। वह अपने बाबा को माँ बहन की गालियां दे रहा था। मैं जानता था क्या बात है। उस रोज़ दोपहर को उसका बाप बहुत गुस्से के आलम में घर लौटा था। उसका अपने मालिक से झगड़ा हुआ था और उसने इसे नौकरी से निकाल दिया था। घर पहुंचते ही उसने हसनी पर अपना गुस्सा उतारना शुरू कर दिया। हमें हसनी के रोने चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई दी थीं। मेरी अम्मां ने हसनी के बाबा की मलामत भी की थी कि क्यों बिलावजह बेकसूर बच्चे को उधेड़े दे रहा है। मैंने देखा, उसकी कमर और कंधों पर नील पड़े थे और एक आँख भी सूज कर नीली हो गई थी। हसनी का बाप हर रात झोंपड़ें में घुसते ही, कपड़े बदलने या मुँह-हाथ धोने से पहले, हसनी की ठुकाई शुरू कर देता था। जब तक थक न जाता, उसे मारता रहता। घूंसों और लातों से, लकड़ी, रस्सी, पेटी, जो कुछ हाथ लगता उससे उसे पीटने लगता, और साथ में ज़ोर-ज़ोर से गालियां भी देता जाता।
इस कदर धुनाई करता कि हसनी की चीखों से सारा मुहल्ला गूंज उठता। पड़ोस के लोग उसकी मदद को पहुंचते और उसके बाप के चुंगल से उसे छुड़ाते। हसनी के बाप का ये रोज़ का मामूल था, मगर मेरा बाबा मुझे हफ्ते में एक या दो बार मारता था जब उसका मिज़ाज बिगड़ा हुआ होता। जब ज़्यादा पैसे न कमाए होते तो मेरी और अहमद और रज़ा की जान को आ जाता और खूब पिटाई करता। मगर मेरी अम्मां बीच में पड़ कर रोने चिल्लाने लगती कि क्यों बच्चों को मारे डाल रहे हो? क्यों इन्हें अपाहज किए देते हो? बाबा पलट कर अम्मां पर पिल पड़ता और वह चीख कर हम से बाहर निकल जाने को कहती। जब तक हम वापिस घर में आते, हमारा बाबा ठंडा होकर एक कोने में बैठा होता या अम्मां से कह रहा होता, ''बच्चों से कहो, आकर कुछ खा पी लें।''
लेकिन हसनी के बाप को अपने बाकी बच्चों से कुछ गरज़ न थी, सिर्फ हसनी को पीटता था, बाकी बच्चों को कुछ न कहता। और हसनी की अम्मां भी कभी उसे बाहर भाग जाने को न कहती। इसलिए कि हसनी का बाबा दरवाज़े को घेरे खड़ा होता और वहीं से हमला करके हसनी को लातों और घूंसों की ज़द पर रख लेता। बाल पकड़ कर उसका सर दीवार से टकराने लगता। उस रोज़ पहली बार उसने दोपहर को घर पहुंच कर हसनी को पीटना शुरू कर दिया था। हसनी बहुत बिगड़ा हुआ था। मैंने उसे मामूल कर लाने के लिए कहा, ''चलो ऊपर चलते हैं''। कूड़े के गढ़े को पार करके हम कुंओं वाले मैदान में पहुंच गए और एक कुंएं के पास बैठ गए। मैंने बहुत कोशिश की मगर वह एक लफ्ज़ न बोला। आखिर मैं कुंएं के पास लेट गया और उसमें सर डाल कर गाय की आवाज़ें निकालीं, कुत्ते की तरह भौंका, कहकहे लगाए, रोया, जो कुछ मुझे आता था सब किया। लेकिन हसनी जूं का तूं, मुँह सुजाए, गमगीन बैठा लाठी से अपनी टांग पर ज़रबें लगाता रहा। आखिर मैंने सीटी बजाकर उससे पूछा, ''हसनी, क्या हुआ?''
हसनी ने जवाब न दिया। मैंने ज़ोर से पुकारकर कहा, ''हसनी, ओ हसनी!''
इस पर उसने पलट कर पूछा, ''क्या है?''
मैंने कहा, ''यूं मुँह फुलाए रखने से कैसे चलेगा?''
बोला, ''न चले, मुझे क्या।''
मैंने कहा, ''खुदा के लिए, अब कुढऩा बंद करो।''
बोला, ''कैसे बंद करूं? मेरे हाथ में है क्या?''
मैं उठ खड़ा हुआ और उससे कहने लगा, ''चलो उठ जाओ, उठो, कुछ करते हैं जिससे तुम्हारी हालत ठीक हो।''
हसनी ने एक बार फिर लाठी अपनी पिंडली पर मारी और पूछा, ''क्या करेंगे?''
मैं सोच में पड़ गया। कुछ समझ में न आया, क्या किया जाये कि हसनी की हालत ठीक हो। मैंने कहा, ''चलो सड़क पर जाकर गाडिय़ां देखें।''
उसने जवाब दिया, ''इससे क्या फायदा होगा?''
मैंने कहा, ''उस रोज़ की तरह मय्यत-गाडिय़ां गिनेंगे। देखते हैं एक घंटे में कितनी गुज़रती हैं।''
बोला, ''जितनी भी गुजरें, गुज़रती रहें। मुझे क्या।''
मैंने कहा, ''चलो फिर हाजी तैमूर के भट्टे की छत से पत्थर फेंके।''
बेज़ार होकर बोला, ''मैं नहीं जाता। तुम्हारा जी चाहे तो जाकर फेंकने लगो।''
मैं कूड़े के ढेर पर बैठ गया। वह किसी तरह मेरी कोई बात सुनने को तैय्यार न था। मैंने कहा, ''सबसे अच्छा ये कि चौक में चलते हैं, वहां बड़े तमाशे हैं।''
बोला, ''कौन कौन से?''
मैंने कहा, ''सिनेमाघर में जाकर तस्वीरें देखते हैं, बाद में संगतराशों के चौक के पीछे जाकर दरवेश सग-दोस्त का तमाशा देखेंगे।''
बोला, ''चौक में पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगी।''
मैंने कहा, ''गाड़ी में चलेंगे।''
बोला, ''पैसे कहाँ हैं?''
मैंने कहा, ''मेरे पास बारह रयाल हैं।''
बोला, ''उन्हें अपने पास ही रखो।''
मैंने कहा, ''चलो चल कर कुछ खाते हैं। ठीक है?''
बिगड़कर कहने लगा, ''मुझे कुछ नहीं खाना।''
अब मैं आजिज़ हो गया। यूंही सर उठा कर इधर-उधर देख रहा था कि शकराई के बाग पर नज़र पड़ी। मैंने कहा, ''ए हसनी, चल कर फल चुराते हैं।''
उसने जवाब दिया, ''हाँ, आज मुझे कम मार पड़ी है कि अब बागवान से भी पिटवाना चाहते हो?''
कुछ देर हम दोनों चुप रहे। भट्टे के दूसरी तरफ से दो आदमी निकले, कुछ देर खड़े हमें देखते रहे, फिर बाग की दीवार कूद कर अंदर चले गए। कुछ चीखें सुनाई दीं, फिर बाग से कई लोगों के कहकहे लगाने की आवाज़ें आईं। मैंने हसनी से कहा, ''मुझसे क्यों नाराज़ हो?''
बोला, ''तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।''
हम फिर चुप हो गए और हसनी उसी तरह लाठी से अपनी टांग पर ज़रबें लगाता रहा।
मैंने कहा, ''इतना मत मारो। पागल हो गए हो?''
बोला, ''ठीक है। मुझे दर्द नहीं होता।''
मैंने कहा, ''अच्छा कोई बात करो।''
बोला, ''मुझे कोई बात नहीं करनी।''
आखिर तंग आकर मैं चिल्लाया, ''बस करो अब! बहुत हो गया। उठो, उठ जाओ अब!''
हम दोनों उठ कर चल पड़े। यूं ही कुंओं के बीच से गुज़रते हुए मैंने कहा, ''हसनी।''
बोला, ''क्या है?''
मैंने कहा, ''सच बताओ, क्या चाहते हो? तुम जो चाहो मैं करूंगा, तुम्हारे लिए सब कुछ करूंगा।''
बोला, ''चाहता हूँ इस कुत्ते के बच्चे बाबा की ऐसी ठुकाई करूं कि बस।''
मैंने कहा, ''ठीक है, फिर करते क्यों नहीं?''
उसने जवाब दिया, ''मैं अकेला कैसे करूं? मुझ में इतना ज़ोर नहीं।''
मैंने कहा, ''पता है, तुममें इतना ज़ोर नहीं।''
वह उठ कर खड़ा हो गया मुझसे पूछने लगा, ''तुम मेरा साथ दो तो हम दोनों मिलकर उससे हिसाब साफ कर सकते हैं।''
मैं सोच में पड़ गया। मुझे उसके बाबा से डर लगता था, बहुत डर लगता था। सब बच्चे हसनी के बाबा से डरते थे। हसनी का बाप बच्चों का दुश्मन था; कोई उसके पास न जाता, कोई उसकी तरफ नज़र उठा कर न देखता। वह किसी के सलाम का कभी जवाब न देता था, सिर्फ मुड़ कर घूरने लगता था। मेरा बाबा कहता था कि ये मरदूद पागल है, इसका दिमाग ठिकाने पर नहीं है। अब मैं भला किस तरह जा कर उसकी ठुकाई कर सकता था? लेकिन अगर ऐसा न करता तो हसनी मुझसे नाराज़ हो जाता और गुस्सा करता। और मैं नहीं चाहता था कि हसनी मुझ पर गुस्सा करे। मैं इसी सोच में था कि हसनी ने कहा, ''मेरी मदद नहीं करना चाहते?''
मैंने कहा, ''क्यों नहीं करना चाहता, ज़रूर करना चाहता हूँ।''
वह बोला, ''फिर जवाब क्यों नहीं देते?''
मैंने कहा, ''आखिर हम उसकी ठुकाई कैसे कर सकते हैं?''
हसनी बोला, ''तुम रात को मेरे घर आना। दोनों अंदर जाकर कोने में छुप जाऐंगे। जैसे ही वह अंदर घुसेगा, दोनों उस पर हमला कर देंगे। टांगे खींच कर उसे ज़मीन पर गिरा देंगे और खूब पिटाई करेंगे।''
मैंने पूछा, ''और उसके बाद क्या होगा?''
उसने कहा, ''कुछ भी नहीं होगा। बस उसकी समझ में आ जाएगा कि पिटाई का मज़ा कैसा होता है। और मेरा दिल ठंडा हो जाएगा।''
मैंने कहा, ''बहुत अच्छा।''
इस तरह हम दोनों रात को उसके झोंपड़े में पहुंचे। रात तो नहीं हुई थी, मगरिब का वक्त था जब अंधेरा छाने लगता है। हसनी का बाबा अभी नहीं आया था। हसनी की अम्मां ने कहा कि जाओ, घर के लिए पानी भर लाओ। हम पंप के पास पहुंचे, पानी भरा और फिर वहीं इंतिज़ार में खड़े हो गए। इतनी देर तक इस टांग से उस टांग पर वज़न डालते रहे कि दूर से हसनी का बाबा आता दिखाई दिया। वह कुछ झुका हुआ चल रहा था और कंधे पर एक थैला उठाए हुए था।
हसनी बोला, ''आ गया कुत्ते का बच्चा।''
हम दौड़ पड़े और झोंपड़ों के बीच में से होकर उसके घर जा छुपे। हसनी की अम्मां बाहर बैठी चूल्हे पर टमाटर पका रही थी। हसनी का छोटा भाई अपनी अम्मां के पास बैठा बिलक रहा था। हम आंगन पार करके आगे बढ़े, पानी का जग खिड़की में रखा और अंदर चले गए। अंदर अंधेरा था। उसकी अम्मां ने बाहर से पुकार कर कहा, ''हसनी, ओ हसनी, बत्ती जला दे।''
हसनी ने बत्ती जलाई। उसकी छोटी बहन एक कोने में पड़ी सो रही थी। मैंने कहा, ''अब क्या करें?''
वह बोला, ''कुछ नहीं, बस दरवाज़े के पास बैठ जाओ। बाकी मुझे पर छोड़ दो। मैं वहां बैठकर इंतिज़ार करने लगा। हसनी भी दूसरे कोने में जाकर बैठ गया। अभी तक कुछ भी नहीं हुआ था।''
हसनी ने कहा, ''याद रखना, तुम्हें उसकी टांगों से लिपटना है।''
मैंने पूछा, ''और तुम क्या करोगे?''
वह बोला, ''पहले मैं उसकी ठोढ़ी पर एक घूँसा रसीद करूंगा, और फिर उसके ऊपर सवार होकर उसे ज़मीन पर गिरा लूंगा और खूब कूटूंगा।''
मुझे डर लग रहा था। मालूम नहीं इसका क्या अंजाम होगा। अभी मैं इंतिज़ार में बैठा था कि बाहर से उसके बाबा के चिल्लाने की आवाज़ आई। पहले उसने ज़ोर का नारा बुलंद किया और फिर चीख कर कहने लगा, ''बदबख्त औरत! मेरे आने से भी पहले तू ने खाना पकाना शुरू कर दिया?''
हसनी की माँ ने जवाब दिया, ''तो और क्या करती? घर में घुसते ही तो तुम्हें कुछ खाने को चाहिए  होता है।''
हसनी के बाबा ने चिल्ला कर जवाब दिया, ''सिर्फ मुझे चाहिए होता है? तुझे और तेरे इन पिल्लों को नहीं?''
फिर हसनी की माँ के चिल्लाने की आवाज़ आई। ''या इलाही! खुदा करे तेरी टांग टूट जाए!''
हसनी ने कहा, ''सुना?''
मैंने पूछा, ''क्या?''
हसनी ने कहा, ''अम्मा को लात मारी है। वहशी दीवाना!''
दुबारा हसनी के बाबा की आवाज़ बुलंद हुई। ''ये कुत्ते का बच्चा यहां क्यों सो रहा है?''
उसकी माँ ने कहा, ''तो फिर कहाँ सोए?''
वह चिल्लाया, ''मुझे क्या मालूम? किसी और जगह। किसी कोने में।''
वह सहन से दाखिल हुआ और अपना बोझा दरवाज़े के पास उतार कर खांसने लगा। बहुत देर तक खांसता और अपने सीने की कसाफत बाहर थूकता रहा। फिर उसने ज़ेर-लब दो-तीन गालियां दीं, पानी का बर्तन लेकर मुँह धोया और दो-तीन घूँट पिये। इसके बाद कमरे की तरफ बढ़ा। उसके जूतों की आवाज़ सुन कर मेरा दिल बैठने लगा। जब वह कमरे में दाखिल हुआ तो हसनी बिलकुल डरी हुई बिल्ली की तरह आधा बैठा आधा खड़ा पीछे को जाने लगा। उसके बाबा ने दाँत पीसे और गुर्राया।  हसनी की पीठ दीवार से लगी हुई थी। उसने पूछा, ''क्या करोगे?''
उसका बाप ज़हरीली हंसी हंस कर बोला, ''कुछ नहीं। तुझ जैसी मुसीबत के साथ कोई क्या कर सकता है।''
अचानक वह मेरी तरफ मुतवज्जा हुआ और मुझे सर से पांव तक देखकर मूंछों पर हाथ फेरने लगा। मैं, वहशत-ज़दा, बैठे बैठे पीछे को खिसकने लगा। हसनी के बाबा ने कहा, ''वाह वा! ये मोटा रीछ यहां क्या कर रहा है?''
हसनी बोला, ''मेरा दोस्त है, अब्दुल आका का बेटा।''
उसने कहा, ''किसी का भी हो, मेरे घर में क्या कर रहा है?''
हसनी बोला, ''इसे मैंने बुलाया है।''
उसने कहा, ''क्यों? इसका अपना कोई ठिकाना नहीं है?''
हसनी बोला, ''है क्यों नहीं। हम से अच्छा है।''
उसने कहा, ''तो फिर? यहां क्यों आया है?''
फिर वह मेरी तरफ मुड़ कर चिल्लाया, ''दफा हो जा यहां से। उठ, भाग!''
मैं डर कर उठने लगा, और हसनी का बाबा और भी ज़ोर से चीखा ''भाग!''
हसनी कमरे के कोने में था, वहां से बोला, ''ये नहीं जाएगा। यहीं रूकेगा।''
हसनी का बाबा उस तरफ मुड़ा और घूँसा तान कर  हसनी की तरफ बढऩे लगा। दोनों बाज़ू हवा में फैला कर कहने लगा, ''हरामज़ादे, तेरी इतनी हिम्मत हो गई कि अपने बाप को जवाब देने लगा!''
हसनी की छोटी बहन की आँख खुल गई और वह खौफज़दा हो कर रोती हुई कमरे से बाहर भागी। वह इसी तरह घूँसा ताने आगे बढ़ रहा था कि हसनी ज़ोर से चिल्लाया, ''मारो!''
मैंने हमला कर दिया। उसका बाबा लपक कर बढ़ा तो हसनी अपनी जगह से हट गया और उसका घूँसा दीवार से टकराया। मैंने झुक कर उसकी टांग दबोच ली। हसनी भी पीछे से निकल आया और उसकी दूसरी टांग पकड़ ली। हम दोनों ने ज़ोर से खींचा और वह चीखता चिल्लाता और हाँपता हुआ हमारे ऊपर गिर पड़ा। पहले उसने मेरे मुँह पर घूंसा मारा, फिर हसनी के मुँह पर। फिर दोनों घूंसे हम दोनों के सरों पर एक साथ रसीद किये। हम दोनों ने ज़ोर लगाया और बूढ़े आदमी के नीचे से निकल आए। हसनी ने गालियां बकते हुए अपने बाबा के चूतड़ पर एक ज़ोर की लात मारी और हम दोनों भाग कर बाहर आ गए। हसनी के बाबा के ज़ोर-ज़ोर से चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आती रहें : ''तुझे मार डालूंगा! तू अकेला ही कम मुसीबत था कि इस हरामज़ादे को भी ले आया!''
ये कहते हुए वह हमारे पीछे लपका। हसनी की मा हिरासाँ, चूल्हे से लगी खड़ी थी और उसकी समझ में न आता था कि क्या करे। हम उसके बराबर से दौड़ते हुए  निकल गए और तूफान की रफ्तार से दौड़ते हुए बीच का रास्ता लेकर मुर्दे नहलाने वाले मकान के गढ़े का रुख किया। पीछे से हसनी के बाबा की आवाज़ें सुनाई देती रहीं कि ''पकड़ो! पकड़ो!''
वह कुछ दूर तक हमारे पीछे दौड़ा और फिर रुक कर चिल्लाने और गालियां देने लगा। अंधेरा हो चुका था। वहां कोई न था जो हमारे पीछे दौड़े और हमें पकडऩे की कोशिश करे। हम पंप के पास से निकल कर गढ़े पर पहुंच गए। दोनों की सांस फूली हुई थी और एक दूसरे का हाथ पकड़े इधर-उधर देख रहे थे कि हसनी का बाबा या कोई और हमारा पीछा न कर रहा हो।
मैंने हसनी से कहा, ''बेहतर होगा कि गढ़े से निकल कर ऊपर चलें।''
हसनी बोला, ''हाँ, वर्ना कुछ देर में वह कुत्ते का बच्चा डंडा लेकर आएगा और हमारा काम तमाम कर देगा।''
हम गढ़े से निकल आए और एक टीले पर जा बैठे। जब मेरा सांस दरुस्त हुआ तो मैंने हसनी से कहा, ''हम उसके हाथ से खूब बच निकले।''
हसनी बोला, ''मगर अफसोस कि उसकी ज़्यादा मरम्मत न कर सके।''
मैंने पूछा, ''घर कब वापिस चलोगे?''
हसनी बोला, ''घर वापिस? मज़ाक करते हो? वह तो चाहता ही होगा कि मैं घर पहुंचूं और वह मुझे पकड़कर तुक्का-बूटी कर डाले।''
मैंने कहा, ''फिर क्या करना चाहते हो?''
हसनी बोला, ''कुछ नहीं।''
मैंने पूछा, ''रात को कहाँ जाओगे?''
बोला, ''कहीं भी नहीं। कोई जगह ही नहीं है।''
मैंने कहा, ''मेरे साथ चलो। मेरे घर।''
बोला, ''हाँ, ताकि तुम्हारे  बाबा के हाथ आ जाऊं। दोनों हरामज़ादे एक जैसे हैं। उनके दिल में ज़र्रा-भर रहम नहीं।''
मैंने कहा, ''अच्छा अगर आज रात घर नहीं भी गए तो कल क्या करोगे? परसों क्या करोगे? आखिर तो वापिस जाना ही होगा।''
हसनी बोला, ''पता नहीं। हो सकता है कहीं और चला जाऊं।''
मैंने कहा, ''मसलन कहाँ?''
बोला, ''कहीं भी।''
मैंने कहा, ''और करोगे क्या?''
बोला, ''क्या पता। कुछ न कुछ कर ही लूंगा। किसी का शागिर्द बन जाऊंगा, या हम्माली कर लूंगा।''
मैंने कहा, ''तुम अभी छोटे हो। तुम्हें कोई नहीं रखेगा।''
बोला, ''क्यों?''
मैंने कहा, ''इसलिए कि तुम्हें कोई काम नहीं आता।''
बोला, ''कुछ नहीं आता, फिर भी दुकानों के सामने झाड़ू तो दे सकता हूँ।''
मैंने कहा, ''मगर किसी बड़े के कहे बिना तो तुम्हें कोई रखेगा नहीं।''
बोला, ''अगर कुछ न हुआ तो टीन-डिब्बे जमा कर बेचूंगा।''
मैंने कहा, ''और रात को सोओगे कहाँ?''
बोला, ''खंडहरों में।''
मैंने कहा, ''कोई फायदा नहीं, दो-चार दिन इस तरह रहने के बाद या तो भूखे मर जाओगे या कोई मुसीबत सर पर आ पड़ेगी।''
कहने लगा, ''नामुमकिन। मैं नहीं मरूंगा। जा के भीख मांग लूंगा और ज़िंदा रहूँगा।''
मैंने कहा, ''हाँ, तुम इसी ख्याल में मगन रहो। तुम्हें पकड़ के गदा-खाने ले जाएंगे। असदोल के बच्चे याद नहीं रहे? और रज़ा तुर्क की बहन?''
बोला, ''तो फिर क्या करूँ?''
मैंने कहा, ''मुझे नहीं पता। बेहतर होगा कि घर वापिस चले जाओ।''
दोनों चुप हो गए। चांद निकल आया था और सारे में रोशनी फैली हुई थी, सिवाए कुंओं के दायरों के जिन्हें कोई भी चीज़ रोशन नहीं कर सकती थी। झोंपड़ों में कहीं कहीं चिराग जलते दिखाई दे रहे थे। हसनी ने अपने इर्दगिर्द नज़र डाली और बोला, ''घर वापिस नहीं जा सकता। इस बार तो वह जान से मार डालेगा।''
हम फिर खामोश हो गए और झींगुरों की आवाज़ें सुनने लगे। हसनी अचानक उठ खड़ा हुआ और बोला, ''सुनो, मुझे एक तरकीब सूझी है। तुम अभी दौड़ते हुए जाओ और झोंपड़ों के पास पहुंचते ही रोना चिल्लाना शुरू कर दो और सर पीट-पीट कर सबसे कहो कि हसनी कुंए में गिर गया है।''
मैं भी चौंक कर उठ खड़ा हुआ। मेरा दिल डूबने लगा। मैंने कहा, ''क्या? तुम कुंए में गिरने वाले हो?''
हसनी बोला, ''मैं गधा हूँ क्या कि कुंए में गिरूंगा? बस तुम ऐसे ही कह दो कि कुंए में गिर गया। तब देखना बाबा का कैसा हाल होता है।''
मैंने कहा, ''और उसके बाद?''
बोला, ''उसके बाद कुछ नहीं। मैं कहीं जा के छुप जाऊंगा।''
मैंने कहा, ''वह कुंओं में तलाश करेंगे।''
बोला, ''सब कुंओं में नहीं तलाश कर सकते। एक दो कुंए थोड़ी हैं। आखिर थक जाएंगे और समझ लेंगे कि मैं मर गया हूँ। फिर सब एक जगह जमा होकर मेरे लिए रोएंगे-पीटेंगे और कुरआन का खत्म करेंगे। बाबा और अम्मां भी अपना सर पीटेंगे और दहाड़ें मारेंगे।''
मैंने कहा, ''हसनी, ये काम ठीक नहीं है।''
इस ने पूछा, ''क्यों? ठीक क्यों नहीं है?''
मैंने कहा, ''फर्ज़ करो तुम्हारा बाबा सदमे से मर जाये। या तुम्हारी अम्मां। फिर क्या करोगे?''
हसनी बोला, ''ये सब तुम्हारा ख्याल है। वह ऐसे नहीं हैं। मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ। ये लोग मरने वाले नहीं। और फिर जब वह सीना कूटने और मातम करने लगे तो तुम मुझे आ के बता देना और मैं दौड़ के घर चला जाऊंगा। जब वह देखेंगे कि मैं सही-सलामत हूँ और कुंए में नहीं गिरा तो किस कदर खुश होंगे। फिर मेरा ख्याल है बाबा भी ठीक हो जाएगा और मुझे मारना पीटना छोड़ देगा।''
मैंने कहा, ''मगर...''
बोला, ''मगर क्या?''
मैंने कहा, ''मुझे तुम्हारे बाबा से डर लगता है। हो सकता है वह ये खबर सुनकर मुझे ही मार डाले।''
बोला, ''तुम्हें मेरे बाबा से क्या लेना-देना? तुम तो बस झोंपड़ों के पास पहुंच कर चीखने लगना कि हसनी कुंए में गिर गया, हसनी कुएं में गिर गया।''
मैंने कहा, ''ये कहते हुए तो रोना भी पड़ेगा। अगर रोना न आया तो?''
हसनी ने मुझे सर से पांव तक देखा और बोला, ''अजीब गधे हो तुम। अंधेरे में किसी को क्या पता चलेगा कि तुम रो रहे हो या नहीं रो रहे हो?''
मैंने कहा, ''अच्छा, और तुम क्या करोगे?''
बोला, ''मैं जा के भट्टे में छुप जाऊंगा।''
मैंने पूछा, ''और मगर भूखे मर गए?''
ताज्जुब से पूछने लगा, ''तो तुम मेरे लिए रोटी और पानी नहीं लाओगे क्या? हैं? नहीं लाओगे?''
मैंने कहा, ''हाँ, लाऊँगा।''
बोला, ''तो बस ठीक है। अब जाओ।''
मैं अभी तक दो-दिला हो रहा था कि जाऊं या न जाऊं, कि हसनी ने मेरा हाथ  पकड़ लिया और बोला, ''आओ मैं तुम्हें दिखा दूं कि मैं कहाँ छुपूंगा।''
हम हाजी तैमूर के ईंटों के भट्टे की तरफ चल दिए। अभी कुंओं के बीच से गुज़र रहे थे कि कुछ कुत्तों ने हम पर हमला कर दिया। मैंने और हसनी ने पत्थर मार कर उन्हें भगा दिया और फिर भट्टे के गिर्द चक्कर काट कर आखिरी कोठड़ी के पास पहुंचे जिसकी छत गिर चुकी थी और किसी को शुबहा न हो सकता था कि यहां कोई छुपा होगा। हसनी ने मुझसे कहा, ''मैं यहां छुपा हूँगा, ठीक है?''
मैंने कहा, ''ठीक है।''
बोला, ''तो फिर अब खड़े क्यों हो, जाओ। याद रखना, तुम्हें खूब ज़ोर ज़ोर से चीखना चिल्लाना है।''
मैंने कहा, ''हाँ, याद है।''
अभी मैं चला ही था कि हसनी ने फिर पुकारा। मैंने पूछा, ''क्या है?''
बोला, ''ये भी याद रखना कि मैं भूखा हूँ। सुबह मेरे लिए रोटी और पानी ज़रूर लाना।''
मैंने कहा, ''ज़रूर लाऊँगा।''
मैं कोठड़ी का चक्कर लगा कर कुंओं के बीच से गुज़रता हुआ मुर्दे नहलाने के गढ़े के पास पहुंचा जहां कुत्ते जमा थे। वह मुझे देखकर भाग गए। मैं गढ़े से बाहर निकला और पंप के पास पहुंचा। मेरे हलक में जलन हो रही थी, उसमें गर्द-ओ-गुबार बहुत चला गया था। मैंने थोड़ा सा पानी पिया और आगे चला। अचानक मुझे याद आया कि मुझे दौड़ते और चीखते हुए जाना है। मैं दौड़ता और चिल्लाता हुआ झोंपड़ों की तरफ बढऩे लगा। बहुत से लोग झोंपड़ों के बाहर खड़े थे। मुझे कुछ $खबर न थी कि क्या हुआ है, मैंने तो सर पीट-पीट कर चिल्लाना शुरू कर दिया जैसे हसनी सचमुच कुएं में गिर गया हो। जो लोग दूर खड़े थे वह भी करीब आ गए। मैंने अपने बाबा और हसनी के बाबा को देखा जो एक दूसरे से तकरार कर रहे थे। मैं हिचकियां लेते हुए बोला, ''हसनी! हसनी!''
हसनी का बाप जो हाथ में डंडा लिए हुए था, पूछने लगा, ''हसनी को क्या हुआ? हैं? क्या हुआ उसे?''
मैंने कहा, ''गिर पड़ा, गिर पड़ा...'' और रोने लगा, सचमुच रोने लगा, मेरे आँसू खुद-ब-खुद निकल कर चेहरे पर बहने लगे। हसनी के बाबा ने चीख कर पूछा, ''कहाँ गिर पड़ा? बोल, मेरा हसनी कहां गिर पड़ा?''
मैंने चीख कर कहा, ''कुएं में... कुंए में गिर पड़ा।''
पहले तो सब लोग एकदम खामोश हो गए, फिर अजीब तरह का हमहमा बुलंद हुआ। दूर-ओ-नज़दीक से चीखने चिलाने की बिखरी हुई आवाज़ें सुनाई देने लगीं। ''हसनी कुंए में गिर पड़ा! हसनी कुंए में गिर पड़ा!''
आदमीयों के हाथ-पांव फूल गए और उनकी समझ में न आया कि क्या करें। जो लोग अब तक झोंपड़ों में थे, बाहर निकल आए। कुछ लोग लालटेन ले आए और सब लपकते हुए मुर्दे नहलाने के गढ़े की तरफ चल दिए। मैं ज़मीन पर फसकड़ा मारे बैठा रो रहा था। मेरे बाबा ने मझुक कर मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खड़ा कर दिया। बोला, ''उठो, चल कर बताओ कौन से कुंए में गिरा है।''
हम दोनों भी दौड़ते हुए सब लोगों के पीछे रवाना हुए। अभी सड़क से आगे न निकले थे कि कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और मेरे और बाबा के साथ साथ दौडऩे लगे। वह दौड़ते हुए पूछते जाते थे, ''कौन सा कुँआं है? कौन से वाले में गिरा है?''
मुर्दे नहलाने वाले मकान के गढ़े के पास से गुज़र कर हम कुंओं के पास पहुंचे। चांद और बुलंद हो गया था और कुंओं के दायरे और ज़्यादा अँधेरे और गहरे मालूम हो रहे थे। सब लोग वहां खड़े थे। हसनी के बाबा ने बेद (बेंत) की तरह कांपते हुए मेरे कंधों को पकड़ लिया और झिंझोड़ते हुए पूछा, ''कहां है? कहां है?''
और इससे पहले कि मैं कोई जवाब दूं, उसने खुद को कूड़े के ढेर पर गिरा लिया और ऊंची आवाज़ में रोने लगा। दो-तीन आदमी उसके पास आ गए और अब्बास चर्खी उसे तसल्लीयां देने लगा कि ''घबराओ मत, हम उसे अभी बाहर निकाल लेते हैं। कुछ नहीं हुआ, कोई बात नहीं। रोओ मत। खुद को हलाक मत करो। हम अभी उसे तलाश कर लेंगे।''
जब हसनी का बाबा चुप हुआ तो एक और हमहमा बुलंद हुआ। औरतें रोती-धोती आ पहुंचीं और उनमें आगे-आगे हसनी की अम्मां थी। वह अपना सर और मुँह पीट रही थी और रो-रो कर पुकार रही थी, ''मेरा हसनी, मेरा हसनी, मेरा हसनी, मेरा हसनी!''
वह कुछ और भी कह रही थी जो मेरी समझ में न आया। अब्बास चर्खी आगे आया और मुझसे पूछने लगा, ''सुनो बच्चे, बताओ कौन से कुंए में गिरा है?''
मैंने कहा, ''मुझे नहीं मालूम।''
हसनी का बाबा मेरी तरफ झपटा और बोला, ''हरामज़ादे! सच-सच बता कि मेरे बेटे का क्या हुआ?''
कादिर आका ने उसे रोका और कहा, ''ज़रा ठहरो, इसे सोच कर बताने दो।''
मैं हिचकियां ले-लेकर रोता रहा और बोला, ''हसनी के बाबा ने हम दोनों को पकड़ कर खूब मारा था और...''
हसनी का बाबा बोला, ''अच्छा अच्छा, ये बता कि वह गिरा कहाँ है?''
मेरे बाबा ने भी कहा, ''हाँ, जल्दी बताओ।''
अब्बास चर्खी ने कहा, ''अरे इसे कुछ  बोलने तो दो। ये क्या तरीका है!''
मैंने कहा, ''हम दोनों भाग कर यहां आ गए। हसनी मुझसे काफी आगे था। हम दोनों दौड़ते हुए जा रहे थे। हसनी डर रहा था कि उसका बाबा आकर हम दोनों को पकड़ लेगा। वह मुझसे बहुत तेज़ दौड़ रहा था... बहुत तेज़। मैंने मुड़ कर देखा कि उसका बाबा तो नहीं आ रहा है। कोई नहीं आ रहा था। मैंने हसनी को आवाज़ दी: हसनी, ठहरो! ठहरो! कोई नहीं आ रहा! वह बीच में पहुंचा था कि एकदम चीख मारी और कुंए में गिर गया।''
हसनी के बाबा ने पूछा, ''कहाँ गिरा था?''
मैंने कहा, ''मैं तो समझा था ज़मीन पर गिरा है। मैंने हर तरफ आवाज़ें दीं। मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने हर तरफ ढूंढ़ा। कहीं नहीं मिला।''
हसनी के बाबा ने फिर दहाड़ कर पूछा, ''कौन से कुंए में गिरा था?''
अब्बास चर्खी गुस्से से बोला, ''इसे क्या पता होगा कि कौन से वाले में गिरा है? हमें खुद ही ढूंढना होगा।''
फिर वह बाकी मर्दो की तरफ मुँह करके बोला, ''चलो ढूंढना शुरू करें। एहतियात से काम लेना!''
जब वह आगे बढ़े तो उसकी आवाज़ें थम गईं। कोई रो नहीं रहा था, न कोई चीख चिल्ला रहा था। सिर्फ हसनी की अम्मां सिसकियां ले रही थी और दूसरी औरतें उसे तसल्लीयां दे रही थीं। ''रोओ मत बहन! खामोश रहो। अभी ये लोग उसे ढूंढ कर बाहर निकाल लाएंगे।''
उनमें से कोई मुसलसल ''शश! शश!'' की आवाज़ें निकाल रहा था, जैसे हसनी सो रहा हो और उसे डर हो कि उसकी आँख न खुल जाए।
सब लोग कुछ कुंओं के पास से गुज़रे। फिर हसनी के बाबा ने गाय की सी ऊंची आवाज़ में उसे पुकारा, ''हसनी! हसनी!'' वह इस कदर गुस्से और झुंझलाहट में था कि अगर हसनी कुंए में खड़ा होता और बाहर निकल आता तो ये उसे पकड़ कर उसकी खूब ठुकाई करता। अब्बास चर्खी ने कहा, ''खामोश रहो, खामोश रहो, हमें काम करने दो।''
कोई अंधेरे में बोला, ''रस्सी और लालटेन की ज़रूरत होगी। खाली हाथ तो कुंए में उतर नहीं सकते।''
कुछ लोग दौड़ते हुए बस्ती की तरफ चल दिए और दो आदमी लालटेनें लेकर आगे बढ़ आए। अब्बास चर्खी ने एक लालटेन हाथ में ली और कुंए की मुंडेर पर झुककर उसे अंदर लटकाया। सब लोग कुंए के गिर्द दायरा बनाकर खड़े हो गए। अब्बास आका जिसका सर अभी कुंए के अंदर था, घुटी हुई आवाज़ में बोला, ''मेरा ख्याल नहीं है कि इस कुंए में गिरा होगा।''
फिर वह दूसरे कुंए की तरफ चल पड़ा। इस दफा मुसय्यब ने झुककर लालटेन को कुंए में लटकाया और आवाज़ को बिसातियों की तरह खींच कर पुकारा, ''कहाँ हो बच्चे? कहाँ हो?''
जवाब में कोई आवाज़ न आई। फिर वह तीसरे कुंए के पास पहुंचे। इसके बाद चौथे कुंए पर। फिर पांचवें पर। फिर छठे पर। फिर उनकी दो टोलियां बन गईं। फिर और लालटेनें आ गईं। सात आठ दस लालटेनें, और बहुत सी रस्सी। कुछ लोग रस्सी में गिरहें डालने लगे। सब लोग आगे ही आगे बढ़ते गए लेकिन हसनी कहीं न मिला। उन सब पर झुंझलाहट सवार होने लगी और वह ज़ोर-ज़ोर से बातें करने लगे। यहां तक कि एक कुंए पर पहुंच कर किसी ने सबको आवाज़ दी। ये अब्बास आका था। सब लपक कर उसके पास पहुंचे और उसे घेर लिया। अब्बास आका घबराई हुई आवाज़ में बोला, ''मुझे लगता है इसी कुंए में है। मुझे कुछ आवाज़ आई है। जैसे कोई कुंए की तह में खड़ा रो रहा हो।''
सब ने दम साध लिया। कुछ लोग कुंए के अंदर झुके और कान लगा कर सुनने लगे। फिर बोले, ''हाँ वाकई, इसी कुंए में है।'' हसनी के बाबा ने फिर चीखना शुरू कर दिया। ''जल्दी करो, जल्दी करो! मेरे बच्चे को यहां से बाहर निकलो। मेरे बच्चे को बाहर निकालो।''
मुसय्यब बोला, ''नीचे कौन जाएगा?''
कादिर ने कहा, ''पुराना कुँआ है। शायद दीवार झड़ती हो।''
हसनी के बाबा ने कहा, ''नहीं नहीं, बखुदा! नहीं झड़ेगी। अंदर जाओ, जा कर उसे निकाल लाओ!''
सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे। अब्बास चर्खी ने कहा, ''क्या कोई मर्द नहीं? अच्छा, मैं खुद जाता हूँ। रस्सी उतारो।''
अब्बास आका की बीवी औरतों के हुजूम में से चीख कर बोली, ''नहीं नहीं, तुम नहीं उतर सकते। तुम्हें कुंए में उतरना नहीं आता!''
अब्बास आका झिल्लाकर बोला, ''चुप कर औरत! अपने काम से काम रख! मैं नहीं देख सकता कि इसका बच्चा अन्दर मर जाए।''
अब्बास आका की बीवी भीड़ को चीर कर आगे बढ़ आई और दौड़ती हुई उससे लिपट गई। ''नहीं नहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी... नहीं जाने दूंगी।''
अब्बास आका ने अपनी बीवी को एक चांटा रसीद किया और बोला, ''हट यहां से दूर हो! कैसी औरत से पाला पड़ा है!'' और फिर चिल्लाकर कहा, ''रस्सी!''
रस्सी लाई गई और उसे कस कर अब्बास आका की कमर में बांध दिया गया। फिर उसकी एक एक गिरह को खींच कर देखा गया। अब्बास आका ने कहा, ''एहतियात से, कहीं बीच में छोड़ ना देना।''
कुछ लोग बोले, ''परेशान मत हो। एहतियात से करेंगे।''
अब्बास आका ने उतरने के लिए तैय्यार होकर लालटेन हाथ में थामी और कुंए में झुक कर तह का जायज़ा लिया। फिर लालटेन किसी और को पकड़ा कर ज़ोर से बिसमिल्लाह पढ़ी। सबने फौरन जवाब में सलवात पढ़ी। हसनी के बाबा ने दोनों हाथ आसमान की तरफ उठाए और कहा, ''अर्हमुर-राहिमीन! या जद्दे-हुसैन-ए-मज़लूम! या जद्दे-फातिमा ज़हरा! या जद्दे-खदीजा कुबरा, मेरे बच्चे को बचा लीजिए! मेरा हसनी ज़िंदा निकल आए!''
अब्बास आका कुएं में उतरा और दोनों कुहनीयां कुंए की मुंडेर पर टेक कर बोला, ''एहतियात से काम लेना। रस्सी को मज़बूत पकडऩा। जब मैं रस्सी को झटका दूं तो ऊपर खींच लेना।''
उसकी बीवी, जो हमारे बिलकुल पीछे खड़ी थी, फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। मेरी अम्मां उसे दिलासा देने लगी।
अब्बास आका नीचे उतर गया। रस्सी उसी तरह पाँच-छह लोगों की गिरफ्त में थी जो उसे थोड़ा थोड़ा करके छोड़ रहे थे और जेर-लब कुछ बोलते भी जा रहे थे। हसनी का बाबा अपने गिर्द चक्कर काट रहा था और होंठ दांतों में दबाये हाथ मल रहा था। वह मुँह ही मुँह में कुछ बोल रहा था और खुदा-खुदा कर रहा था। मेरे ज़हन से बिलकुल फरामोश हो चुका था कि हसनी भट्टे की कोठड़ी में है। मेरे दिल में कोई कह रहा था कि काश हसनी इसी कुंए में मौजूद हो, कि अब्बास आका खाली हाथ बाहर न निकले और सब लोग खुश हो जाएं। कुछ वक्त इसी तरह गुज़रा और फिर मेरे बाबा ने, जो दूसरे लोगों के साथ रस्सी को थामे हुए था, कहा, ''ऊपर खींचो! ऊपर खींचो!''
रहमत ने पूछा, ''क्यों?''
मेरे बाबा ने कहा, ''देखते नहीं, रस्सी हल रही है, अंधे हो क्या?''
सब खामोश हो गए और रस्सी को ऊपर खींचने लगे। हसनी का बाबा गर्दन उठा कर सबके सरों के ऊपर से देख रहा था और अब्बास आका के नमूदार होने का मुंतज़िर था। तब अब्बास आका के दोनों हाथ कुएं की मुंडेर को पकड़ते दिखाई दिए। फिर उसने कुहनीयां टेकीं और ज़ोर लगा कर अपने जिस्म को ऊपर उठाया। ज़मीन पर आकर वह सीधा लेट गया और ज़ोर-ज़ोर से सांस लेने लगा। कादिर ने पूछा, ''वह अन्दर था? वह अन्दर था?''
हसनी के बाबा ने ज़ोर की चीख मारी और रोने लगा। अब्बास आका करवट लेकर आधा उठ बैठा और बोला, ''लगता था मेरा दम घुट जाएगा।''
कादिर ने पूछा, ''मर गया क्या?''
अब्बास आका ने कहा, ''वहां सिर्फ एक मरा हुआ कुत्ता पड़ा सड़ रहा था।''
मुसय्यब ने कहा, ''कहीं तुम्हें मुगालता न हुआ हो।''
अब्बास आका बोला, ''अबे अहमक, क्या मैं मरे हुए कुत्ते और हसनी में फर्क नहीं कर सकता?''
वह उठ खड़ा हुआ और अपनी कमर में बंधी हुई रस्सी खोल दी। फिर सब दुबारा जत्था बनाकर अगले कुएं की तरफ गए। फिर उससे अगले कुएं पर, और फिर उससे अगले पर। वह फिर दो टोलियों में बंट गए, फिर चार टोलियों में, और लालटेन हाथ लिए हर कुएं में झुक-झुक कर हसनी को पुकारने लगे। तब ही मैं चुपके से खिसक कर झोंपड़ों की तरफ भाग पड़ा। मैं कोनों-खद्दों में अंधेरे की ओट लेकर चल रहा था ताकि किसी को पता न चले। मैंने पंप से पानी पिया और फिर टीन की दीवार के पीछे से गुज़र कर अपने झोंपड़े में पहुंच गया। वहां कोई न था। मैंने एक नान और एक टूटे हुए दस्ते वाला आबखोरा उठा लिया। फिर मैं दौड़ता हुआ बाहर निकला, पंप से आबखौरे में पानी भरा, मुर्दे नहलाने वाले गढ़े के पास से गुज़र कर सड़क के किनारे-किनारे लंबा चक्कर काटता हुआ हाजी तैमूर के भट्टे पर निकला और उस कोठड़ी पर पहुंचा जहां हसनी छुपा हुआ था। मैंने गर्दन उठाकर दबी हुई आवाज़ में उसे पुकारा। कोई जवाब न आया। दुबारा आवाज़ दी। फिर जवाब न आया। मैंने ऊंची आवाज़ में पुकारा मगर कुछ नहीं। मुझ पर खौफ छा गया। फिर मुझे ख्याल आया कि शायद उसे पता न चला हो कि ये मैं हूँ, सो मैंने सीटी बजाना शुरू किया - वही खुश-आवाज़ सीटी जिसके ज़रीये में उसे पैगाम देता था कि हसनी, आ जाओ, काम का वक्त हो गया। एकदम मुझे अपने सर के ऊपर हसनी के सीटी बजाने की आवाज़ सुनाई दी। वह कोठड़ी की छत पर औंधा लेटा मेरी तरफ देख रहा था। मैंने कहा, ''ए हसनी!''
बोला, ''चुपके से ऊपर आ जाओ।''
मैंने आबखोरा उसे थमाया और ईंटों वाली दीवार का सहारा  लेकर ऊपर पहुंच गया। दोनों आहिस्ता-आहिस्ता रेंगते हुए आगे बढ़े और भट्टे की चिमनी के पास जा बैठे।  मैंने कहा, ''तुम्हें तो कोठड़ी के अंदर छुपना था।''
वह बोला, ''ये देखने ऊपर आया था कि क्या हो रहा है।''
मैंने कहा, ''तुम्हें पता है अगर वह लोग तुम्हें देख लें तो क्या होगा?''
बोला, ''मुश्किल है। मुझे कोई नहीं देख सकता।'' ये कह कर वह हँसने लगा।
मैंने पूछा, ''हंस क्यों रहे हो?''
बोला, ''बाबा का सोच कर हंस रहा हूँ। और बाकी सब लोगों का। देखो ज़रा, कैसे दौड़ते फिर रहे हैं।''
उसने कुंओं की तरफ इशारा किया। वह लोग लालटेन उठाए कभी एक कुएं के पास जाते कभी दूसरे के। कोई टोली किसी एक कुएं के पास जमकर रह गई थी और वहां से हिलती ही न थी।
मैंने कहा, ''हमने अच्छा नहीं किया हसनी।''
बोला, ''क्यों?''
मैंने कहा, ''तुम्हारा बाबा खुद को मारे डाल रहा है। तुम्हें पता नहीं उसका कितना बुरा हाल है।''
बोला, ''फिक्र मत करो। वह खुद को नहीं मारने का। अम्मां क्या कर रही है?''
मैंने कहा, ''क्या कर रही है? सर पीट-पीट कर रो रही है।''
बोला, ''रोने दो।''
मैंने कहा, ''तुम्हें पता है, अब्बास आका कुंए में उतरा था, और तुम्हारी जगह एक मरा हुआ कुत्ता निकाल कर लाया था।''
हसनी बोला, ''अपने बाप की लाश लाया होगा।''
हम दोनों हँसने लगे। फिर मैंने नान निकाली और आधी-आधी तोड़कर दोनों ने खाई। मुझे प्यास नहीं लगी थी, लेकिन हसनी ने कुछ घूँट पिए। मैंने कहा, ''क्या कहते हो, अब नीचे इन लोगों के पास चलें?''
बोला, ''क्या होगा?''
मैंने कहा, ''क़िस्सा खत्म हो जाएगा। उन्हें एक-एक कुंआं झांकना नहीं पड़ेगा।''
बोला, ''अभी से? अभी उन्हें घूमने दो।''
मैंने कहा, ''उनमें से कोई कुएं में गिर कर मर गया तो?''
बोला, ''फ़िक्र मत करो। ये सब कुत्ते की औलाद हैं। इतनी आसानी से मरने वाले नहीं।''
मैंने कहा, ''लेकिन हम जो कर रहे हैं वह बहुत बुरा है।''
उसने गर्दन मोड़ कर मुझे गौर से देखा। बोला, ''और वह जो हमारी ठुकाई करने से पहले खाना नहीं खाते, वह अच्छा करते हैं?''
मैंने कहा, ''खुदा के लिए हसनी, अब बस करो। चलो उनके पास चलते हैं।''
वह बोला, ''मैं तो नहीं जाने का।''
मैंने पूछा, ''मगर क्यों?''
बोला, ''वापिस जा के क्या कहेंगे?''
मैंने कहा, ''कह देना कि शकराई के बाग में फल खाने गया था।''
बोला, ''फिर तो तुम्हारा झूठ पकड़ा जाएगा।''
मैंने कहा, ''मैं कह दूंगा, मुझे क्या पता कहाँ गया, मैं समझा था कुएं में गिर गया।''
बोला, ''नहीं, वह फौरन समझ जाएंगे, और फिर हमारी शामत आ जाएगी।''
मैंने कहा, ''नहीं आएगी, खुदा के लिए तुम चलो।''
बोला, ''मैं तो नहीं चलने का।''
मैंने कहा, ''तो ठीक है, मैं जा के बता देता हूँ कि हसनी कुएं में नहीं गिरा, हाजी तैमूर की कोठड़ी में छुपा बैठा है।''
उसने गर्दन घुमाकर मुझे बुरी तरह घूरा। ''ठीक है। कह दो जा के। इसके बाद तुम अलग और मैं अलग। फिर तुम्हें मेरी शक्ल भी नज़र नहीं आएगी।''
मैंने पूछा, ''तो फिर कब वापिस चलोगे?''
बोला, ''खत्म वाले दिन। जिस वक्त मेरे लिए कुरआन खत्म हो रहा होगा, उस वक्त एकदम दाखिल हो जाऊंगा। तब बड़ा मज़ा आएगा।''
मैंने कहा, ''बकवास मत करो। क्या मज़ा आएगा?''
बोला, ''पता है, जिस वक्त वह सब सीना पीट-पीट कर रो रहे होंगे, मैं आहिस्सा आहिस्ता चलता हुआ उनके बिलकुल बीच में पहुंच जाऊंगा और ज़ोर से सलाम करूंगा। पहले तो वह सब बौखला जाएंगे, फिर डर जाएंगे। औरतें चीखने चिल्लाने लगेंगी। बच्चे भाग जाएंगे और सोचेंगे कि मैं कब्र से निकल कर आया हूँ। फिर जब वह लोग देखेंगे कि मैं सचमुच ज़िंदा हूँ, हंस रहा हूँ, हाथ-पैर हिला रहा हूँ, तो सब के सब खुश हो जाएंगे। वह हवा में छलांगे लगाएंगे, ज़मीन पर गिर जाएंगे, वह मुझे लिपटाकर मेरा मुँह चूमेंगे। तुम कहते हो मज़ा नहीं आएगा? हैं?''
हम ने फिर अपनी नज़रें उन लोगों पर जमा दीं जो लालटैन हाथ में लटकाए कुंओं के दरमयान इधर से उधर गश्त कर रहे थे और थोड़ी-थोड़ी देर बाद मर्दों और औरतों के ज़ोर-ज़ोर से बोलने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। मैंने कहा, ''ठीक है, अब मैं उन लोगों के पास जाता हूँ...''
वह बोला, ''ठीक है, मगर उन्हें बताना मत।''
हम चारों हाथ-पैरों पर रेंगते हुए आगे बढ़े, दूर दूर तक गौर से देखा और फिर नीचे उतर आए। मैं सड़क के गिर्द लंबा चक्कर काटकर मुर्दे नहलाने के गढ़े के पास से गुज़रा और फिर वापिस ऊपर की तरफ चलने लगा। वह सब अब तक एक कुंए के गिर्द दायरे में जमा थे। मैं दौड़ता हुआ उनके पास जा पहुंचा। मैंने अपनी अम्मां को देखा जो सर पीट-पीट कर ऊंची आवाज़ में रो रही थी। मर्दों ने रस्सी को कुंए की तह तक लटका रखा था। मैं लोगों की टांगों में से निकल कर आगे कुएं की मुंडेर तक पहुंच गया। वहां मैंने अब्बास चर्खी को देखा जो किसी से कह रहा था, ''रस्सी हिला रहा है। ऊपर खींचो, ऊपर खींचो!''
$कादिर ने पूछा, ''मगर क्यों?''
अब्बास आका ने कहा, ''अंधे हो क्या? देखते नहीं रस्सी हिल रही है?''
सब खामोश हो गए और रस्सी को ऊपर खींचने लगे। हसनी का बाबा, जो मेरे सर के बिलकुल पीछे खड़ा था, मुसलसल सीना पीटते हुए कहा रहा था, ''या खदीजा कुबरा, या इमाम मुस्तफा, या गरीबुल-गुरबा, या सय्यद-उश-शुहदा।'' तब मैंने अपने बाबा को कुंए की मुंडेर पर कुहनीयां टेक कर बाहर निकलते देखा। वह सर से पैर तक स्याह हो चुका था और ज़ोर-ज़ोर से हांप रहा था। अब्बास आका ने कहा, ''लेट जाओ, लेट जाओ, और लंबे लंबे सांस लो।''
कुछ लोगों ने बाबा की बगलों में हाथ दे कर उसे ज़मीन पर लिटा दिया।

2.
सुबह हुई तो कोई काम पर न गया। सब बुरी तरह थक कर अपने अपने झोंपड़े को लौट गए। हसनी उन्हें नहीं मिला था। अब्बास आका ने कहा था, ''कोई फायदा नहीं। सारे कुंओं में नहीं ढूंढ सकते।''
वह उन ज़्यादा गहरे कुंओं पर पहुंच गए थे जो नीचे तह में एक दूसरे से मिले हुए थे और उनमें गंदा  पानी बह रहा था। इन कुओं के अंधेरे में अजीब अजीब चीज़ें दिखाई देती थीं। उसता हबीब के सामने अचानक गाय के कद का एक जानवर आ गया था जिसकी चार-पाँच दुमें थीं और जबड़ों में एक मरे हुए आदमी का सर लिए वह इधर-उधर चल-फिर रहा था। सय्यद को कुछ नंगे और कुछ ऊनी लिबास पहने लोग दिखाई दिए थे जो कुएं की दीवार में लगे थे। उसे देखते ही वह लोग गंदे पानी में कूद कर गायब हो गए थे। मीर जलाल ने अपनी आँखों से बड़े बड़े काले पर देखे थे जो इधर से उधर उड़ते फिर रहे थे। इन सब का कहना था कि कुंए की तह से अजीब-ओ-गरीब आवाज़ें सुनाई देती हैं, जैसे बिल्लियां रो रही हों और नज़र न आने वाली औरतें कहकहे लगा रही हों। यहां तक कि कुछ लोगों ने संज और शीपोर की आवाज़ें भी सुनें, जैसी आशूरे के दिनों में निकलती हैं। उन्हें अपनी पुश्त से नोहे पढ़े जाने और लोगों के गिरिया करने की आवाज़ें सुनाई दी थीं। अब्बास आका ने कह दिया कि ''अब कुछ फायदा नहीं, दौड़-धूप से कुछ नहीं होगा और हसनी अब नहीं मिलेगा।'' तब वह सब, थकन और नींद से चूर, बस्ती की तरफ लौट आए थे और अब सो रहे थे। सिर्फ हसनी का बाबा अब तक नहीं सोया था और झोपड़ों के दरमियान मुतवातिर इधर-उधर भटक रहा था और अपने सर को दाएं-बाएं और आगे-पीछे झटकता जा रहा था। वह रंज से अपने हाथ पर हाथ मारता और कहता, ''देखा क्या हुआ! देखा मेरा बच्चा  कैसे हाथ से जाता रहा! कैसे जवानी में मर गया!''
हसनी के बाबा का रोना चिल्लाना अब थम चुका था। इसके बजाय अब उसका ध्यान अजीब-ओ-गरीब चीज़ों से उलझ रहा था। झोंपड़ों की छतें, मकबरों के तारीक दरवाज़े, दीवार के साथ लगी ढके हुए पीपों की कतारें, झोपड़ों के आगे लटके टाट के पर्दों पर पड़े धब्बे। थोड़ी-थोड़ी देर बाद वह रुक कर ज़मीन से कोई बेकार-सी चीज़ उठा लेता - टीन का टुकड़ा, या टूटी हुई प्याली, या घिसा हुआ जूता - और कुछ देर उससे खेलने के बाद उसे दूर उछाल कर किसी और चीज़ की तरफ मुतवज्जा हो जाता। वह जेर-लब बड़बड़ाता जा रहा था, ''अब उसे कीड़े खा रहे हैं। सब खत्म हो गया। मेरा हसनी चला गया।''
मैं कई बार उसके पास से गुज़रा। उसकी हालत वही रही। उसने मुझे नहीं देखा, या देखा तो मुझ पर तवज्जा नहीं दी। कुछ देर बाद मुझे अचानक याद आया कि हसनी भूखा होगा और मेरा इंतिज़ार कर रहा होगा। मैं सीधा अपने झोंपड़े पहुंचा। सब सो रहे थे। मेरा बाबा नींद में लुढ़ककर एक तरफा को हो गया था और उसके मिट्टी में सने पैर बाहर को निकले हुए थे। मैंने एक नान और मुट्ठी भर शकर ली और बाहर निकल आया। हर तरफ सन्नाटा और वीरानी थी। हसनी का बाबा एक मकान के पीछे खड़ा था और दीवार पर नाखुन से खुरच कर कुछ लिख रहा था। सूरज चढ़ आया था और रोशनी हर तरफ फैल गई थी। पंप के पास पहुंच कर मैंने पानी पिया। दूर-दूर तक कोई न था। मैं मुर्दे नहलाने वाले कूड़े के गढ़े में उतरा और दूसरी तरफ निकल कर हाजी तैमूर के भट्टे में पहुंचा और उस कोठड़ी की तरफ चला जहां मुझे मालूम था हसनी मेरे इंतिज़ार में बैठा है। वह सो रहा था। जब मैंने आवाज दी तो चौंक कर उठ गया और घबरा कर कहने लगा, ''कौन है? कौन है?''
मैंने कहा, ''डरो मत। मैं हूँ मैं।''
वह उठकर बैठ गया। उसका चेहरा बदला हुआ था। आँखों के गिर्द गढ़े थे और हाथ कंपकपां रहे थे। मैंने पूछा, ''क्या हुआ? ठीक तो हो?''
बोला, ''मैंने खाब देखा है कि मैं कुंए में गिर गया हूँ और बाहर निकलने के लिए हाथ-पांव मार रहा हूँ मगर निकल नहीं पाता।''
मैंने कहा, ''तुम्हारा अपना कसूर है। तुम ही ये खेल खेलना चाहते थे। तुम्हारे बाबा का दिमाग चल गया है।''
वह कुछ न बोला और खुद को घसीटता हुआ कोठड़ी से बाहर ले गया। हम दोनों धूप में बैठ गए। मैंने नान और मुट्ठी-भर शकर उसे दे दी। पानी अभी खत्म नहीं हुआ था। उसने आबखोरा उठा कर चंद घूंट भरे और थोड़ा सा पानी लेकर मुंह पर छींटे मारे। जब उसका  हाल कुछ ठिकाने पर आया तो मुझसे पूछने लगा, ''क्या हुआ?'' मैंने कहा, ''सबको यकीन हो गया है कि तुम मर चुके हो।''
बोला, ''तुमने क्या किया?''
मैंने कहा, ''मैंने कुछ नहीं किया। किसी से नहीं कहा।''
कहने लगा, ''अब वह लोग क्या करना चाहते हैं?''
मैंने कहा, ''अभी कुछ तै नहीं हुआ कि क्या करेंगे।''
उसने पूछा, ''मेरे लिए कुरआन खत्म नहीं करायेंगे?''
मैंने कहा, ''पता नहीं।''
बोला, ''मेरा ख्याल है आज सहपहर को करायेंगे।''
मैंने पूछा, ''तुम्हें कैसे पता है?''
बोला, ''याद नहीं जब बीबी का पोता मरा था तो अगले दिन खत्म कराया था?''
मैंने कहा, ''अगर ऐसा है तो आज का दिन तुम्हारा है।''
बोला, ''हाँ। खुदा करे ऐसा ही हो। अब मुझमें और हौसला नहीं।''
मैंने कहा, ''इंशाअल्लाह ऐसा ही होगा।''
कहने  लगा, ''कहीं भूल न जाना। फौरन मुझे आकर बताना।''
मैंने कहा, ''नहीं भूल कैसे जाऊंगा? लेकिन तुम ज़बरदस्त ठुकाई के लिए तैय्यार रहना।''
बोला, ''ठुकाई नहीं होगी। सब लोग मुझे देखकर खुश हो जाएंगे।''
मैंने कहा, ''तुम यही समझते रहो असल बात तो शाम को मालूम होगी।''
बोला, ''शर्त लगाते हो?''
मैंने पूछा, ''कैसी शर्त?''
बोला, ''अगर मुझे देखकर गुस्से में आ गए कि मैं ज़िंदा क्यों हूँ, मरा क्यों नहीं, और मेरी पिटाई शुरू कर दी तो तुम जीते, और अगर मुझे देखकर खुश हुए तो मैं जीता। फिर तुम्हें मेरे हाथ से पिटाई नोश-जान करनी होगी।''
मैंने कहा, ''बहुत खूब! मैं तुम्हारे लिए इतनी मुसीबत उठा रहा हूँ, और तुम मेरी पिटाई करोगे?''
हँसने लगा। बोला, ''मज़ाक कर रहा था। तुम्हें आइसक्रीम खरीद के खिलाऊंगा।''
मैंने कहा, ''हाँ, ये ठीक है।''
उसने नान का एक लुकमा तोड़ कर मुँह में रखा और बोला, ''अब क्या करें?''
मैंने कहा, ''कुछ नहीं। तुम जा के कोठड़ी में छुपो और मैं बस्ती में जा के देखता हूँ कि क्या हो रहा है।''
बोला, ''अगर सहपहर को खत्म कुरआन की ठहरे तो मुझे आ के बताओगे ना?''
मैंने कहा, ''हाँ बताऊंगा।''
और सहपहर ही को खत्म कुरआन होना तै हुआ। हसनी की फातिहा। झोंपड़ों के सामने। अब्बास आ$का ने एक बांस पर काला कपड़ा बांध कर उसे मैदान के सिरे पर गाड़ दिया था। सब घरों से बाहर निकल कर ज़मीन पर बैठ गए। औरतें एक तरफ और मर्द दूसरी तरफ। दूसरी बस्तियों में भी इत्तिला पहुंच गई थी और लोग टोलियों में आ रहे थे। यूसु$फ शाह की घाटी, सरपंच, शम्स आबाद के भट्टे, शुत्रखून और मुल्ला अहमद की बस्ती, हर जगह से। वह सब अनजाने लोग थे, तरह-तरह के कपड़े पहने थे। ज्योंही कोई टोली मैदान में पहुंचती, औरतें हसनी की अम्मां के पास चली जातीं जो खुरचे हुए खूनम-खून चेहरे के साथ अपने झोंपड़े के सामने बैठी थी। वह अब रो नहीं रही थी, बस सर को इधर-उधर हिलाती और सीना पीटती जाती थी। औरतें उसके सामने पहुंचते ही रोने और अपना सर और मुंह पीटने लगतीं और कहतीं, ''खाहर-जान, खाहर-जान (बड़ी बहन) ये तुम पर क्या उफ्ताद (आफत) पड़ी।''
हसनी का बाबा हमारे झोंपड़े के सामने बैठा था। बल्कि बैठा क्या था, ज़मीन पर पड़ा हुआ था। मबहूत-सा अपने सामने तके जा रहा था। हर नए आने-वाले को जैसे ही पता चलता कि मरने-वाले का बाप कौन है, वह उसके पास जाकर सलाम करता। कोई जवाब सुने बगैर आने-वाला एक कोने में बैठ जाता। अब्बास आका जो खड़ा  हुआ था, ऊंची आवाज़ में कहता, ''फतिहा!'' मर्द लोग फातिहा पढऩे लगते। उसता (उस्ताद) हबीब हाथ में पानी का बर्तन लिए लोगों में घूमता और प्यासों को पानी पिलाता फिर रहा था। दो बूढ़े आदमी जो गरीबा की घाटी से तंबाकू का बड़ा सा थैला लेकर आए थे, जल्दी-जल्दी अखबार के कागज़ फाड़-फाड़ कर सिगरेट बनाते और उन्हें कैनी में रखते जा रहे थे। और बीबी का बड़ा बेटा रमज़ान सैनी उठाए लोगों को सिगरेट पेश कर रहा था। सब लोग सिगरेट और पानी पी रहे थे, सिवाए हसनी के बाबा के, जो न सिगरेट पी रहा था न पानी, बस थोड़ी-थोड़ी देर बाद अपने होंटों पर ज़बान फेरता और कभी-कभी ज़मीन की तरफ मुँह करके थूकता था।
कोई घंटा-भर गुज़रा होगा कि सड़क की सम्त से कुछ लोग तेज़-तेज़ आते दिखाई दिए। सब गर्दन फेर कर उनकी तरफ देखने लगे। अब्बास आका ने ज़ोर से कहा, ''पीरों की घाटी से काले खेमों वाले आए हैं। जाओ, उन्हें यहां ले आओ।''
कई लोग उनकी पेशवाई को आगे बढ़े। काले खेमों वाले फूली हुई सांसों के साथ दौड़ते लपकते आ पहुंचे। उनमें से बहुत सों के हाथों में अलम (झंडे) थे। वह इन सब के आगे आगे चीथड़े लगे कपड़े पहने, गम और परेशानी की हालत में सीना-ज़नी करते दौड़ रहे थे। उनके वस्त (बीच) में एक दुबला-पतला, लंबी गर्दन और ऊंचे अमामे वाला आखुंद (साफा पहना शिया मौलवी) था। औरतें दस्ते के आखिर में थीं, नंगे-पैर और धूल मैं अटी। जब वह लोग छोटे मैदान के बीच में पहुंचे तो सलवात की आवाज़ें बुलंद हुई। औरतें और मर्द अलग-अलग हो गए। औरतें चीखें मारती हुई हसनी की अम्मां की तरफ चली गईं और मर्द आगे बढ़ आए। बूढ़ों ने हसनी के बाबा को सलाम किया। हसनी के बाबा ने जवाब न दिया। अलमदारों ने अलम बच्चों के हवाले किए और बच्चे उन्हें लेकर बड़ों की पुश्त पर कुछ फासले में खड़े हो गए। तब आखुंद जा कर हमारे झोंपड़े के बाहर लगे पत्थर पर बैठ गया। इस्माईल आका ने ऊंची आवाज़ में कहा, ''सलवात भेजो! बुलंद आवाज़ में सलवात भेजो!''
सब ने सलवात पढ़ी। आखुंद भर्राई, बैठी हुई आवाज़ में बोला, ''बैठ जाएं, सब लोग बैठ जाएं ताकि एक मासूम और बेचारे नौजवान की अज़ा में रोज़ा-ए-कासिम पढ़ें और गिरिया करें।''
पहले उसने कुछ अजीब-ओ-गरीब दुआएं पढ़ीं और फिर रोज़ा-खवानी शुरू की। उसी वक्त गिरिया-व-ज़ारी की सदा बुलंद हुई। सब रो रहे थे। मर्द रो रहे थे, औरतें रो रही थीं, बच्चे रो रहे थे। यहां तक कि मैं भी रो रहा था। सिर्फ हसनी का बाबा था जो नहीं रो रहा था। सि$र्फ पहलू बदल रहा था और सूखे होंठों पर ज़बान फेर रहा था। गिरिया करने की आवाज़ जैसे जैसे ऊंची होती गईं, काले खेमों वाले उठकर खड़े हो गए और अपने सीने खोल दिए। आखुंद भी खड़ा हो गया उसने भी अपना सीना खोल दिया, और और भी ज़्यादा ऊंची आवाज में बोला, ''आओ अब सय्यद-उश-शुहदा की और उस बेगुनाह नौजवान की शादी में सीना-जनी करें।''
ये कहकर उसने नोहा पढऩा शुरू किया। काले खेमों वाले मातम करने लगे। दूसरे मर्द भी खड़े हो गए और अपने सीने खोल कर मातम करने लगे। औरतों की चीख पुकार में और ज़्यादा शिद्दत आ गई और वह एक दूसरे को लिपटा-लिपटा कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। मुझे अचानक ख्याल आया कि यही वक्त है कि मुझे जाकर हसनी को $खबर करनी चाहिए। मुझ पर किसी की तवज्जो न थी। किसी की किसी पर भी तवज्जा न थी। मैं चुपके से वहां से निकल आया। पहले तो उल्टे-कदमों चलता रहा, फिर मुड़ा और आँखों से आँसू पोंछता हुआ तेज़ी से चलने लगा। पंप पर पहुंच कर मैंने थोड़ा-सा पानी पिया और मुर्दे नहलाने के गढ़े में उतरकर दूसरी तरफ पहुंच गया। वहां दूर-दूर तक कोई न था। तब मैंने दौडऩा शुरू कर दिया। मैंने हवा की रफ्तार से कुंओं-वाले अहाते का चक्कर लगाया और आगे बढ़ा। मेरे हवास ठिकाने न थे। सर से पैर तक पसीना बह रहा था। उसी हालत में दौड़ता हुआ मैं हाजी तैमूर के भट्टे में पहुंचा और चक्कर लगाकर पीछे की कोठड़ी के सामने आ गया। हसनी कोठड़ी की छत पर औंधा लेटा हुआ था। $फौरन उठकर नीचे आया और पूछने लगा, ''क्या खबर है?''
मैंने कहा, ''तुम्हारा खत्म हो रहा है।''
उसने पूछा, ''क्या कर रहे हैं वह लोग?''
मैंने कहा, ''सारी बस्तियों और घाटियों से लोग आ गए हैं और तुम्हारा मातम कर रहे हैं।''
वह कुछ देर तक मुझे तकता रहा। फिर बोला, ''तुम किस लिए रो रहे हो?''
मैंने कहा, ''तुम्हारे लिए।''
बोला, ''अजीब गधे हो! तुम्हें तो पता है कि मैं ज़िंदा हूँ, मरा नहीं!''
मैंने कहा, ''ये सब उस आखुंद का कसूर है जिसे काले खेमों वाले लाए हैं। उसने सब को रूला दिया।''
उसने $खुश होकर हाथों को आपस में रगड़ा और कहा, ''तो अब ठीक वक्त है, है ना?''
मैंने कहा, ''हाँ तो। मेरा ख्याल है यही ठीक वक्त है।''
बोला, ''अब देखते हैं कौन शर्त जीतता है।''
मैंने  कहा, ''खुदा करें तुम ही जीत जाओ।''
वह हँसने लगा और ज़ोर से बोला, ''तो चलो फिर, भागो!''
वह फौरन अपनी जगह से दौड़ पड़ा। मैं उसके पीछे पीछे था। हम दोनों दौड़ रहे थे लेकिन हसनी तो बिलकुल हवा की मानिंद उड़ रहा था। कोई भी उसे पकडऩा चाहता तो न पकड़ सकता। मैंने दो-एक बार उसे पुकारा, ''हसनी! हसनी!'' और हसनी ने जवाब दिया, ''होहो!... होहो!''
कि अचानक, एकदम पता नहीं क्या हुआ... मुझे बिलकुल पता नहीं क्या हुआ... किस तरह कहूं कि क्या हुआ... कि अचानक हसनी का पैर किसी चीज़ में पड़ कर रपटा और वह सीधा, बिलकुल सीधा, कुएं में जा गिरा। मैंने सोचा, यानी ये नहीं सोचा कि हसनी कुंए में गिरा है, बल्कि ये सोचा कि वह ज़मीन पर गिरा है। मैं आगे दौड़ा। हसनी कहीं नहीं था। हसनी कुएं में गिर पड़ा था। एक बहुत बड़े कुएं में जो सब कुंओं से बड़ा था। मेरी ज़बान बंद हो गई। मेरे होंठ सिल गए। मैं चाहता था कि ज़ोर से चीखूं, चीख कर कहूँ: ''हसनी!'' मगर न चीख सका। मेरी आवाज़ ही न निकली। मुँह ही न खुला। मैंने बहुत ज़ोर लगाया लेकिन मुँह से हसनी का नाम ही न निकला। मैं घूरे पर बैठ गया और अपने दोनों कंधे ज़ोर से पकड़ लिए। मेरी सांस ही रुक गई थी। मैंने दो-तीन बार कूड़े के ढेर पर अपना सर मारा। फिर उठ खड़ा हुआ। बल्कि खुद खड़ा नहीं हुआ, गोया किसी चीज़ ने मुझे उठा कर पैरों पर खड़ा कर दिया। मैंने दुबारा दौडऩा शुरू किया, हमेशा से कहीं ज़्यादा तेज़। हसनी से भी ज़्यादा तेज़। मेरा दिल करता था, उड़ कर किसी कुएं में जा गिरूं। उसी वक्त मैंने देखा कि मैं सड़क पर पहुंच गया हूँ। पंप के पास पहुंच कर मैंने सांस दुरुस्त किया। तब मेरी ज़बान खुली और मेरे मुँह से निकला, ''हसनी! हसनी! हसनी!'' जिस वक्त मैं मैदान में पहुंचा, सीना-ज़नी खत्म हो चुकी थी। सब लोग दायरा बनाए खामोश बैठे थे। रमज़ान लोगों में सिगरेट तसीम कर रहा था और उसता हबीब पानी का बर्तन उठाए इधर-उधर आ-जा रहा था। मैंने ऊंची आवाज़ में चीख कर कहा, ''हसनी! हसनी! हसनी!'' मैंने मुट्ठीयां भींच कर अपने सर पर मारीं और ज़मीन पर गिर पड़ा सब लोग उठकर मेरे गिर्द जमा हो गए। अब्बास आका ने, जो सब के आगे चलता हुआ मेरे करीब पहुंच गया था, मेरा हाथ पकड़ लिया कि मैं खुद को न मार सकूं। उसने पूछा, ''क्या हुआ? क्या हुआ?'' मैंने चीख कर कहा, ''हसनी! हसनी कुएं में गिर पड़ा!''
ये कह कर मैं ज़मीन पर औंधा हो गया और मुट्ठियों में मिट्टी पकड़ ली। हर तरफ एक हमहमा बुलंद हुआ। सब मुझे तसल्लीयां देते हुए कह रहे थे, ''अच्छा, अच्छा, खुदा रहमत करे, तुम खुद को ज़ख्मी मत करो! सब्र करो!''
मेरा बाबा लोगों को हटाता हुआ आगे आया और बोला, ''चुप हो जाओ बच्चे! उसके माँ-बाप के गम को ताज़ा मत करो!''
मैंने कहा, ''गिर पड़ा! मेरी आँखों के सामने कुएं में गिर पड़ा!''
बाबा ने चीख कर कहा, ''मैं कहता हूँ चुप हो जा! खामोश हो जा गधे के बच्चे!''
मैं उससे भी ऊंची आवाज़ में चीख कर बोला, ''बखुदा वह कुंए में गिर पड़ा! अभी अभी! अभी गिरा है।''
बाबा ने मुझे सहारा देकर खड़ा किया और एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाया। इस्माईल आका ने बाबा को हाथ पकड़ कर पीछे की तरफ खींचा और कहा, ''मत मारो अहमक आदमी! देखते नहीं इसका क्या हाल हो रहा है?''
फिर उसने मुझे सीने से लगाकर कहा, ''सब्र करो, सब्र करो!''
उस्ता हबीब ने इस्माईल को पानी दिया और और इस्माईल आका ने पानी लेकर मेरे मुँह पर छींटे मारे। मैंने खुद को उसके बाज़ूओं से छुड़ाने के लिए बहुत ज़ोर लगाया लेकिन न छुड़ा सका। कुछ लोग और भी ज़ोर लगा रहे थे कि मैं भाग न निकलूं। मैंने एक बार फिर ऊंची आवाज़ में चीख कर कहा, ''हसनी गिर पड़ा! कुएं में गिर पड़ा! हसनी! हसनी!'' इस्माईल आका ने अपना बड़ा-सा हाथ मेरे मुँह पर रख कर मुझे चुप करा दिया और खींचता हुआ मेरे झोंपड़े में ले गया। हसनी के बाबा के सामने से गुज़रते हुए मैंने उसकी तरफ देखा और हाथ से कुएं की सम्त इशारा किया। उसने मेरी तरफ न देखा। खाली नज़रों से अपने सामने तकता रहा। जब मैं झोंपड़े में दाखिल हुआ तो इस्माईल आका ने कहा, ''चुप हो जाओ बच्चे! सब जानते हैं कि हसनी तुम्हारा दोस्त था। तुम दोनों में बहुत यारी थी। मगर अब क्या किया जा सकता है। कज़ा और कदर के फैसलों में किसी का क्या ज़ोर।'' मैंने एक बार फिर चीख कर कहा, ''अभी गिरा है! अभी गिरा है! अभी गिरा है!''
मैं चाहता था कि दौड़कर झोंपड़े से बाहर निकल जाऊं मगर न कर सका। बाबा ने कहा, ''अब क्या कर सकते हैं? बोलो? क्या कर सकते हैं?''
इस्लाईल आका ने कहा, ''ये अपने होश में नहीं है। हाथ-पैर बांध देने चाहिये।''
उन्होंने मेरे हाथ-पैर कस कर बांध दिए। मैंने फिर चीखना शुरू किया। बाबा ने कहा, ''इसके चीखने का क्या ईलाज करें?''
इस्माईल आका ने कहा, ''मुंह भी बांध देते हैं।''
मेरे मुँह पर भी कपड़ा बांध कर मुझे एक कोने में डाल दिया गया। बाबा हाथ मल रहा था और कहता जा रहा था, ''क्या करें, खुदाया!, खुदावंदा, अगर ये इसी तरह रहा तो क्या करेंगे!''
इस्माईल आका ने कहा, ''परेशान मत हो। अभी काले खेमों वाले आखुंद से कहते हैं कि इसके लिए दुआ लिख दें। फिर इसकी हालत ठीक हो जाएगी।''
उसता हबीब बोला, ''अगर ठीक न हुआ तो शाह अब्दुलअज़ीम ले चलेंगे।''
बाबा मुतवातिर रो रहा था और बेचैनी से चक्कर लगाते हुए कहे जा रहा था, ''या इमाम-ए-जमां! या इमाम-ए-जमां! या इमाम-ए-जमां!''
इस्माईल आका ने कहा, ''बेहतर है इसे कुछ देर के लिए तन्हा छोड़ दें। शायद हालत बेहतर हो जाये।''
वह सब झोंपड़े से बाहर चले गए और दरवाजा बंद कर दिया। जमात के सलवात पढऩे की आवाज़ दुबारा बुलंद हुई। और फिर आखुंद की भर्राई हुई आवाज़ सुनाई दी जो दुबारा रोज़ा-ए-कासिम पढ़ रहा था।

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