बेवज़ह-सी वज़ह

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    जून 2014
श्रेणी कहानी
संस्करण जून 2014
लेखक का नाम रामकुमार तिवारी







राणा साहब सरकारी बंगले के बरामदे में पड़ी कुर्सी पर बैठे, पीपल पेड़ के ऊपर का आकाश देख रहे थे। सदा की भांति उनके दाहिने हाथ में दाहिनी मूंछ का बाल था जिसे वे ऐंठ रहे थे।
जमीनी गुंताड़े में उनका दिमाग जब जितना चक्कर काट रहा होता, उनकी नज़रें सामने के आकाश में उतनी ही स्थिर होती और कान उतने ही सजग होकर आसपास की आवाजों को सुनते रहते। यह उनकी सिद्ध अवस्था थी, जिसके सहारे वे दूर-दराज के छोटे से कस्बे के सरकारी महकमे को अपनी शर्तों पर, निजी मिल्कियत की तरह चला रहे थे।
नंदन ने बंगले की बाउंड्रीवाल के किनारे पैदल आने-जाने के लिए बने लोहे के छोटे गेट पर ठिठक कर देखा। ....राणा साहब अपनी चिरपरिचित मुद्रा में बैठे हुए थे। उसने धीरे से गेट खोला और बेआवाज अंदर आ गया। अंदर आकर उसने अपने को सहेजा और फिर स्वर में कुछ अतिरिक्त विनम्रता लाते हुए कहा - ''नमस्ते सर।''
राणा साहब ने उसकी ओर देखे बिना कहा - ''कहां से आ रहे हो।''
''कर वसुलने गया था।''
''क्या हुआ..?''
''जी... दस हजार के करीब।''
''हूं!''
''सर...''
''हूं''
''मैं तीन दिन के लिए गांव जाना चाहता हूं... मां की तबीयत ठीक नहीं है।''
''कब!''
''आज ही चार बजे।''
''ठीक है।''
नंदन को विश्वास नहीं हुआ। उसने अविश्वास से राणा साहब को देखा। वे अपनी उसी मुद्रा में सामने के आकाश को देखते हुए मूंछ के बाल को ऐंठ रहे थे। उसकी नजरों के नीचे पीपल का पेड़ झुनझुने की तरह बज रहा था। उसे भी हवा का चलना महसूस हुआ वह अपने क्वार्टर की ओर चल दिया। वह खुश था जैसे लाटरी खुल गई हो।
नंदन का क्वार्टर राणा साहब के बंगले से थोड़ा आगे बायीं ओर मुड़कर लगभग पचास गज की दूरी पर कालोनी में ही था।
क्वार्टर पहुंचते ही उसने पत्नी को छुट्टी की बात बतलाई और जल्दी से खाना लगाने को कहा। वह जाने की तैयारी करने लगा।
अभी वह एयरबैग में सामान जमा ही रहा था कि चपरासी कृपा ने आते ही
कहा - ''आपको साहब बुला रहे हैं।''
''किसलिए... मैं उन्हीं के पास से ही तो आ रहा हूं।''
''मुझे नहीं पता... आप ही जाकर पूछ लो।''
नंदन के मन में खटका हुआ, कुछ गड़बड़ है। वह तेज चलता हुआ एक पल के लिए किनारे वाले गेट पर रूका और फिर अंदर जाते ही उसने राणा साहब से पूछा - ''सर आपने मुझे बुलाया है।''
''हां, एक काम करो, कर की राशि बैंक में जमा करके रसीद बड़े बाबू को दे देना।''
नंदन ने घड़ी देखी, दो बजने को थे। हिम्मत जुटाकर उसने कहा - ''सर मुझे देर नहीं हो जायेगी। करन खाली है, उसे कह दूं।''
''नहीं, करन को दूसरे काम के लिए बोला है, तुम्हीं जमा कर आओ, अभी बहुत समय है।''
'जी' कहता हुआ नंदन राणा साहब को देखे बिना मुड़ा और अपनी क्वार्टर की ओर मुरझाया हुआ सा चल दिया। उसका सारा उत्साह ठंडा पड़ गया था।
नंदन के जाते ही राणा साहब की मुद्रा अचानक बदल गई। अब उनके दाहिने हाथ में दाहिनी मूंछ का नहीं बायीं मूंछ का एक बाल था। जिसे वे उसी लय में ऐंठते हुए लॉन की घास को देखने लगे।
राणा साहब जब दाहिनी हाथ से बायीं मूंछ का बाल ऐंठते हैं तब वे आकाश को नहीं लॉन की घास को देखते थे और तब आसपास के लोग एक-दूसरे को कुछ इस तरह देखते कि कौन फंस गया है?
नंदन का मन खराब हो गया था। उसके अंदर से गालियां बाहर आने के लिए बार-बार उठ रही थी और वह उन्हें दबाये हुए बैंक जाने की तैयारी करने लगा।
नंदन जानता था कि वह सहज रूप से जाने ही नहीं देगा, कुछ न कुछ अड़ंगा जरूर लगायेगा, इसलिए जब उसने ''ठीक है'' कहा था तब उसे विश्वास नहीं हुआ था।
पत्नी ने खाने की थाली लगाते हुए पूछा - ''कहां लगा दूं।''
नंदन ने झुंझलाते हुए कहा - ''कहीं नहीं, जीवन में क्या खाना ही एकमात्र जरूरी काम है।''
''अरे... क्या हुआ? अभी तुम्हीं ने तो कहा था।''
''कहा था उस समय, अब नहीं।''
पत्नी ने हैरानी से नंदन की ओर देखा और चुप हो गई। एकदम से बिना कुछ बोले चुप हो जाने पर नंदन ने पत्नी की ओर देखा और सहज होकर जाते-जाते रूककर कहा - ''एक काम आ गया जिसके लिए जा रहा हूं और जैसे ही लौटूंगा तुरंत निकलना होगा, नहीं तो बस छूट जायेगी। तुम छोटे टिफिन के डिब्बे में दो-तीन पराठे बनाकर रख देना, जहां समय मिलेगा खा लूंगा।''
नंदन बैंक की ओर चल दिया। बैंक में भीड़ थी। समय तो लगेगा ही। कहीं बस न छूट जाये, उसे शंका होने लगी। वह अंदर ही अंदर अपने से बुदबुदाये जा रहा था - आफिस में क्या चेस्ट नहीं है? दो दिन में क्या हो जाता? वैसे भी यह काम बड़े बाबू का है और जमा तो वह किसी से भी करवा सकता था। लेकिन इस संसार में कुछ लोग सिर्फ विचित्र प्रवृत्तियों को पोषने के लिए जन्म लेते हैं। उनके जीवन का यही एकमात्र उद्देश्य होता है - वातावरण को असहज बनाये रखना और दूसरों को जीने न देना।
जैसे-तैसे लाइन में उसका नंबर आया। राशि जमा हुई। उसने घड़ी देखी बस का समय होने ही जा रहा था। वह अपनी क्वार्टर की ओर भागा।
उसने जल्दी से बैग में टिफिन डाला और दरवाजे की ओर लपकते हुए, पत्नी को आवाज दी -
''कहां हो... मैं जा रहा हूं।''
पत्नी आंगन में थी, जब तक दरवाजे तक आती वह निकल गया था। बड़े बाबू बाहर ही थे, उन्हें रसीद थमाते हुए वह बस स्टैंड की ओर तेजी से चल दिया।
ईश्वर का धन्यवाद... बस छूटते-छूटते मिल गई और बैठने के लिए पीछे एक सीट भी। उसने राहत की सांस ली। हालांकि खाना न खाने के कारण उसके पेट में जलन हो रही थी और साथ ही सिर भी दुख रहा था। इसका ठीक-ठीक आभास उसे सीट पर बैठ जाने के थोड़ी देर बाद हुआ।
घुमावदार घाट पर पीछे की सीट पर बैठा नंदन बीच-बीच में उछल-उछल जाता। कुछ समय बाद उसका जी मचलाने लगा और उसे उल्टी सी लगने लगी।
उसने बैग खोलकर देखा, उसमें पानी की बोतल नहीं थी। जल्दी-जल्दी में वह पानी की बोतल रखना ही भूल गया था।
बस घरघोड़ा बस स्टैंड पर जैसी ही रूकी, वह दरवाजे की ओर लपका। उसकी नजरें दौड़-दौड़कर दवाई की दुकान खोजने लगी। बायीं ओर थोड़ी दूर पर दवाई की दुकान थी। उसने डायजिन टेबलेट का एक पत्ता, सिरदर्द की गोली और साथ ही ठंडे पानी की एक बोतल खरीदी और जल्दी से बस में आकर बैठ गया।
जब कुछ देर बाद भी बस नहीं चली तब उसने कंडक्टर से पूछा - ''क्या बात है?''
कंडक्टर ने बताया ''स्टेपनी का पंचर बनने गया है।''
नंदन ने घड़ी देखी, घड़ी की सुइयां तेजी से भागी जा रही थी। कहीं ट्रेन न छूट जाये।
नंदन के अजीब बेचैनी भरे चेहरे पर चिंता का भाव भी बढ़ गया। पानी की बोतल खोलकर उसने दो-तीन घूंट पानी पीया ही था कि उसे लगा कि उसे उल्टी हो जायेगी। उमस भरी गर्मी में उसका बुरा हाल हो रहा था। डायजिन की टेबलेट चूसते हुए वह स्थिति पर काबू पाने की कोशिश करने लगा।
बस न जाने कितनी जगह रूकते-रूकाते रायगढ़ पहुंची। वह तुरंत रिक्शा पकड़कर रेलवे स्टेशन की ओर चल दिया। स्टेशन पहुंचते ही वह पूछताछ की खिड़की पर गया। पूछने से पता चला कि ट्रेन पचास मिनट लेट है। उसकी जान में जान आयी।
नल के पास पहुंचकर उसने अच्छी तरह से मुंह धोया। उसके पेट में जलन और गैस की उमड़-घुमड़ बढ़ गई थी और साथ ही सिर भी फटे जा रहा था। एकाएक उसके जेहन में बात आयी क्यों न खाना खाकर सिरदर्द की गोली ले ली जाये।
वह बैठने की जगह खोजने लगा। बायीं ओर थोड़ी ही दूर पर बैंच खाली थी। बैंच में बैठकर वह खाने की तैयारी करने लगा। वह पहला निवाला मुंह में डालने ही वाला था कि न जाने कहां से एक अधपगला सा भिखारी दुनिया जहान की सारी लाचारी की मुद्रा में घिघियाता हुआ सामने आकर खाना मांगने लगा।
नंदन ने हाथ से... भाग यहां से भाग का इशारा किया। लेकिन वह कहां भागने वाला था।
ऐसे भिखारी तो बेशर्मी की सारी हदें पार कर चुके होते हैं। वे टस से मस नहीं होते जब तक कुछ न कुछ ले नहीं लेते। सामने वाला व्यक्ति ही उसके लिए अंतिम व्यक्ति होता है।
नंदन दोबारा कुछ और सख्त होकर... भाग... यहां से भाग का इशारा करता- इससे पहले वह हाथ को मुंह तक लाकर खाना दो कि मुद्रा बनाते हुए अजीब अभ्यस्त निगाहों से उसे कुछ इस तरह देखने लगा कि नंदन को अचानक गुस्सा आ गया। उसने टिफिन उसकी ओर फेंकते हुए कहा - ''ले तू ही खा ले'' और हाथ धोने के लिए नल की ओर चल दिया।
टिफिन की आवाज़ से लोग उसकी ओर देखने लगे। एक व्यक्ति ने उसके पास आकर पूछा - ''क्या हुआ?''
''कुछ नहीं'' कहते हुए नंदन ने दूर पड़े टिफिन की ओर देखा और फिर उस भिखारी को... कहां गया? जब वह भिखारी उसे नहीं दिखा तो उसने आसपास और फिर दूर तक उसे देखा। वह वहां नहीं था। इतनी जल्दी कहां बिला गया उसकी नजरें प्लेटफार्म के इस छोर से उस छोर तक जहां तक संभव हुआ उसे खोजने लगी।
दो कुत्ते दौड़कर टिफिन के पास आये और छीनाझपटी कर पराठे खाने लगे। कुत्तों के आपस में लडऩे की आवाजों में सभी की आवाजें डूब गई कुछ लोग कुत्तों को डरा-धमकाकर भगाने लगे।
ट्रेन आने का संकेत हो गया था। ट्रेन दूर से आती हुई दिखी। लोग अपना-अपना सामान पकड़कर खड़े हो गये। थोड़ी ही देर में ट्रेन प्लेटफार्म में आकर रूक गई।
नंदन ने एक उचाट-सी नजर टिफिन के डिब्बे पर डाली और ट्रेन पर चढ़ गया। उसे खिड़की के पास वाली सीट मिल गई। उसने खिड़की पर सिर रख लिया। ट्रेन चली तो हवा के झोकों से उसे कुछ राहत मिली। उसने आंखें बंद कर ली। ट्रेन घर की ओर तेजी से भागी जा रही थी। रायगढ़ स्टेशन का प्लेटफार्म पीछे छूट गया था।
गांव से शहर लाकर उसने मां के स्वास्थ्य का पूरा चेकअप करवाया। डाक्टर ने आश्वस्त किया, घबराने की कोई बात नहीं है, खाने में कोताही करने की वजह से कमजोरी आ गई है और थोड़ी सांस की प्राब्लम है। एक हफ्ते में बिल्कुल ठीक हो जायेगी।
छुट्टी का सारा समय, मां का चेकअप कराने में ही बीत गया। आते-जाते में ही परिवार और गांववालों से जो मुलाकात हो गई, वही हो पायी। इस बार आराम से मिलना-बैठना हो ही नहीं पाया। नंदन के अंदर अधूरे-अधूरे से भाव घिर रहे थे। हां, संतोष की बात यही थी कि मां का चेकअप हो गया और सब ठीक है।
रात में खाना परोसते समय मां ने कहा - ''इतनी दूर आता है, दो-चार दिन की ज्यादा छुट्टी नहीं ले लेता।''
''नहीं मिलती मां, आधा समय तो रास्ते में ही लग जाता है।''
खाना खाने के बाद नंदन ने मां से कहा - ''गांव में कैसा सन्नाटा पसरा है।''
मां ने कहा - ''हां, आजकल लोग जल्दी ही घरों में चले जाते हैं। पहले जैसी चहल-पहल, आपस में बतियाना अब नहीं रहा।'' बातों ही बातों में मां ने बताया - ''गोरेलाल गुज़र गये। ग्यासी पहले ही गुजर गये थे। अब गांव में कोई गवइया-बजइया नहीं बचा।''
गोरेलाल काका के गुज़र जाने की खबर ने नंदन को घेरकर उदास कर दिया। पिछली बार जब वह गांव आया था। गोरेलाल काका से तालाब की बंधान पर अचानक भेंट हो गई थी, बहुत दिनों के बाद। वे खुश हो गये थे और साथ में वह भी। उसके अंदर बचपन की न जाने कितनी स्मृतियां जाग उठी थीं। गोरेलाल काका दो बांसुरियों को एक साथ बजाया करते थे। बजाते समय उनके दोनों गाल, एक-एक करके फूलते-पिचकते रहते। नंदन को जितनी उनकी धुनें आकर्षित करती थीं, उससे ज्यादा बजाते समय उनके चेहरे की भाव भंगिमायें। वह अपना बस्ता लिये घंटों उन्हें देखता सुनता रहता। स्कूल जाना भूल जाता। जिसकी कीमत बाद में चाचा जी से पिटाई खाकर चुकानी पड़ती थी।
उस दिन उसने अपने अंदर के उसी बाल भाव से पूछा था - ''कका आप अभी भी बांसुरियां बजाते हैं।''
''अब कहां, छह आठ महीनों में एकाध बार, जब कभी रात में हूंक उठती है। वैसे सच बतावें, अब बजाने का मन ही नहीं करता।''
''अरे... मन क्यों नहीं करता?''
''क्या बतायें, हम तो ठहरे बूढ़े-जवान बच्चों में भी कोई गाता-बजाता नहीं। भईया, मानो या न मानो, जमाना बदल गया है।''
नंदन लेटे-लेटे बचपन से जब से स्मृति है, गांव के उन सभी जनों को एक-एक करके याद करने लगा जो नहीं रहे थे। गुज़रे हुए जनों की एक पूरी बस्ती उसके आसपास बसती चली गई। उनकी बातें, आवाजें। अंदाज, उनका गुस्सा, अपनापा, प्रेम... सब बादलों की तरह घिर आये।
गांव में इस बीच बहुतेरे बच्चों ने जन्म लिया और वे गुजरे हुये लोगों की जगह में खेलते-कूदते बड़े हो रहे थे। कुछ तो स्कूल-कालेज भी जाने लगे। लेकिन उसके लिए नहीं, उन्हें तो उसने रोज-रोज बढ़ते हुए नहीं देखा, उनकी छवियों की लरियां उसके पास नहीं थीं।
उसके लिए अपने ही गांव की तीन बस्तियां थी। एक गुज़र चुके लोगों की बस्ती, दूसरी जन्मे, बड़े होते बच्चों की जिनमें वह थोड़ी बहुत उपरी पहचान के अलावा, अजनबी ही था और तीसरी, साथ के बचे हुए लोगों की जिनके और नंदन के बीच बीतते समय का इतना प्रभाव था कि कभी वे नंदन के लिए तो कभी नंदन उनके लिए एक औपचारिकता मात्र होते जा रहे थे।
नंदन के लिए जीवन एकदम भिन्न तरह से परिभाषित होते चला जा रहा था। इन्हीं खयालों की आवाजाही के बीच नंदन कब तक जागता रहा और कब सो गया, उसे पता नहीं चला।
सुबह, वह जल्दी उठा, उसी ट्रेन को पकडऩे के लिए, जो तीन दिन पहले उसे लेकर गांव आयी थी।
नंदन जब भी ट्रेन में बैठता - वह अपने को वांशिदे की तरह नहीं, विस्थापित की तरह ही अनुभव करता है जो बस इधर से उधर आ जा रहा है। कई बार तो इसी सोच में सफर पूरा हो जाता और वह दुनिया आ जाती जहां वह जा रहा होता।
ट्रेन सही समय में चल रही थी। रायगढ़ आने ही वाला था। नंदन ने घड़ी देखी और अपने से कहा - ''दस बजे वाली बस मिल जायेगी।''
ट्रेन रूकते ही नंदन जल्दी से उतरा स्टेशन से बाहर जाने के लिए, उसे देखकर एक रिक्शावाला उसकी ओर लपका। रिक्शावाला उसके पास पहुंचता, इससे पहले नंदन पलटकर फिर स्टेशन के अंदर चला गया।
अंदर पहुंचकर वह एक नंबर प्लेटफार्म के किनारे तक गया और लौटकर ओवरब्रिज के पास खड़ा हो गया। कुछ देर खड़े रहने के बाद ओवरब्रिज से चढ़कर उस पार गया और प्लेटफार्म नंबर दो और तीन के चक्कर लगाकर वापस एक नंबर प्लेटफार्म पर आ गया। इस बीच वह दस बजे वाली बस पकडऩे वाली बात ही भूल गया।
प्लेटफार्म पर वह उसी भिखारी को खोज रहा था जिससे खीझकर उसने खाने का टिफिन फेंक दिया था। कहां गया होगा! सोचते-सोचते वह स्टेशन से बाहर आ गया। बाहर ही उसने टी-स्टॉल पर खड़े-खड़े चाय पी और रिक्शा पकड़कर बस स्टैंड आ गया। रिक्शा में बैठे-बैठे भी उसकी नजरें उसे खोजती रहीं। हो सकता है, वह स्टेशन से बस्ती में आ गया हो। जो भी भिखारी दिखता, वह उसे गौर से देखने लगता। लेकिन हर बार की तरह वह नहीं कोई दूसरा ही निकलता।
बस स्टैंड पर बारह बजे की बस चलने ही वाली थी। वह बस में बैठ गया। बस की खिड़की से, वह गुजरते हुए दृश्यों को देख रहा था लेकिन उसकी आंखों में उसी भिखारी का चेहरा बार-बार अटक जाता। उस दिन की घटना उसे रह-रहकर बेचैन कर रही थी। जब उसने स्टेशन में गुस्से से टिफिन फेंका था और वह भिखारी किसी रहस्य की तरह गायब हो गया था। अपनी उसी छवि की कल्पना करके जो उस पल भिखारी की आंखों में बनी होगी-सोच-सोचकर वह बेचैन हो जाता।
घर में व्यस्तता के चलते तो वह भूला रहा, सिवाय उन पलों के जब कंघी करते समय उसने आइने में अपनी आंखों को देखा और उनमें उसी घृणा और नफरत को खोजने लगा था। जिसे देखकर वह भिखारी अदृश्य हो गया था। उस समय उसके अंदर कितनी घृणा और नफरत रही होगी, उसे हिकारत से देखती हुई, कितनी असहनीय कि उस हद का निर्लज्ज, मानवीय गरिमा से सदा के लिए गिरा हुआ व्यक्ति भी हिल गया था। और बचने के लिए न जाने कहां-कहां भाग रहा होगा? शायद अंतिम मनुष्य से भी दूर।
नंदन अपनी उसी छवि को देखने के लिए उसे खोज रहा था जो कभी किसी आइने में नहीं मिलेगी, सिवाय उस भिखारी की आंखों के। जो साक्षी है, उसके उसी छवि की जो उसके अंदर के तमाम भावों से ही बनी थी। वे भाव उसके अंदर ही छिपे हुये थे या वही उन्हें छिपाये हुए था, जो जरा सी असुविधा या असहजता होते ही बाहर आ गये थे।
हमारी छवियां आइनों में नहीं एक-दूसरे की आंखों में रहती हैं। जीवन गहरा, सच्चा, उदात्त होने की जगह कितना उथला, गुणा और भाग से भरा हुआ स्वार्थी और हिंसक है। जो होना नहीं सिर्फ दिखना चाहता है।
नंदन की नज़रों में उसकी वे तमाम छवियां उभरने लगी जो इसी तरह वक्त बेवक्त दूसरों की आंखों में बनी थीं। कितनों ने कितनी बार उसे क्षमा किया और कितनों ने उसी रूप में स्वीकार या नकार दिया। हर स्थिति में मनुष्य बने रहने का जीवन कितना मुश्किल है।
बस, स्टैंड पर खड़ी हो गई। सभी लोग उतर गये, नंदन उतरने वाला आखिरी यात्री था। दोपहर का ढलना शुरू हो गया था। तीन बजने को थे, उसे ध्यान नहीं था। सुबह से उसने कुछ नहीं खाया-पिया, सिवाय एक कप चाय के। आज न उसे भूख लगी, न पेट में जलन हुई और न ही उसके सिर में दर्द था। आज वह भूख, प्यास, दर्द के परे किसी दूसरी ही स्थिति में था।
वह अपना बैग उठाये, राणा साहब से बेखबर, बंगले के सामने से गुज़रते हुए अपने क्वार्टर की ओर जा रहा था।
राणा साहब, सरकारी बंगले के बरामदे में पड़ी कुर्सी पर बैठे पीपल पेड़ के ऊपर का आकाश देख रहे थे। सदा की भांति उनके दाहिने हाथ में दाहिनी मूंछ का एक बाल था जिसे वे ऐंठ रहे थे।
नंदन के जाने के बाद राणा साहब ने दाहिनी मूंछ का बाल छोड़कर बायी मूंछ का बाल पकड़ लिया और लॉन की घास को देखने लगे, जिसे नंदन ने नहीं देखा। लेकिन कृपा ने देख लिया और वह नंदन की ओर पीछे-पीछे चल दिया।
क्वार्टर पहुंचकर नंदन ने पलटकर कृपा को देखा। कृपा कुछ बोलता, इससे पहले हाथ के संकेत से मना करते हुए उसने कहा - ''कल सुबह दस बजे आउंगा।''
कृपा जब तक अविश्वास से नंदन को देखता, वह क्वार्टर के अंदर जा चुका था।






कवि कथाकार, रामकुमार तिवारी अपना रास्ता कुछ अलग तरह से बनाते हुए काफी कम लिखते हैं। संभवत: बहुत पहले उनकी पहली कहानी 'पहल' में छपी थी। अभी 'कुतुब एक्सप्रेस' नाम से एक कहानी संग्रह आया है। इसके पहले एक कविता संग्रह 'कोई मेरी फोटो ले रहा है' प्रकाशित हुआ था। मूल निवासी महोबा के हैं, लम्बे समय से बिलासपुर में रहते आये हैं।

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