समांतरता के संदर्भ : कहानी के बहाने

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    जून 2014
श्रेणी कहानीकार
संस्करण जून 2014
लेखक का नाम राहुल सिंह





कहानीकार/अगली बार प्रियंवद




योगेन्द्र आहूजा, अनिल यादव, मनोज रुपड़ा के बाद तरुण भटनागर की कहानियों पर बात करने का एक आशय यह भी था कि इस तथ्य को पुष्ट किया जा सके कि 1990 के बाद कहानी का पारम्परिक परिदृश्य बदल गया है। किस्सागोई में जो 'श्रव्यता' होती थी, उसकी जगह इन कहानीकारों ने एक 'पाठ्यता' को आबाद किया है। किस्सागो और कहानीकार के इस फर्क को ज्यादा बेहतर तरीके से किसी कहानी पाठ के दौरान महसूस किया जा सकता है। बुनियादी रुप से ये सभी कहानी के बुनकर हैं। तरुण भटनागर भी इस लिहाज से कहानी के एक बुनकर ही ठहरते हैं। और उनकी इस बुनावट की पद्धति को पहचाना भी जा सकता हैं। कई बार तरुण की कहानियों को पढ़ते हुए 'कहानी-सा' कुछ महसूस होता है। यह जो 'कुछ' कहानी-सा है, यह काफी महत्वपूर्ण है। यह कहानी को बरतने की तरुण की अपनी अदा है, जिसे हम 'ट्रीटमेन्ट' भी कह सकते हैं। इस 'ट्रीटमेन्ट' की वजह से कहानी का 'फार्म' और 'फ्रेम' दोनों तरुण के यहाँ बदल जाते हैं। इस बरतने में तरुण की जो निजता शामिल है, उससे उनकी शैली का जन्म होता है। तरुण की कहानियों में आदि, मध्य और अंत वाला पारम्परिक कहानी-विधान कम ही देखने को मिलता है। उनकी जगह सिर्फ और सिर्फ एक प्रस्थान बिन्दु को हम पाते हैं। प्रस्थान बिन्दु एक टेक की तरह। जिससे शुरु होकर कथ्य का फेरा फिर वहीं आकर खत्म होता हो। सनद रहे कि इस फेरे के दौरान कथ्य संप्रेषित हुआ करता है, कहानी फकत एक जरिया भर बनती है। इस तरह तरुण के यहां कहानी विचार या अभिप्रेत को संप्रेषित करने वाले माध्यम के तौर पर दिखती है। बल्कि यहां तक कहा जा सकता है कि तरुण भटनागर की कहानियां अपने मंतव्य को संप्रेषित करने का एक 'बहाना' भर हैं। उनके लिए कहानी में व्यक्त 'विचार' कई बार 'कहानी-पन' से ज्यादा मूल्यवान जान पड़ता है। 'विचार' उनकी कहानियों में दोहरे संकेतक की भूमिका में प्रयुक्त होते हैं। एक ओर वे तरुण के सरोकारों के सूचक हैं तो दूसरी ओर वे संवेदना के संकेतक भी हैं। इसके कारण उनकी कहानियों का 'लास्ट इम्प्रेशन' पाठक के चित्त में कुछ अलग ढंग से दर्ज होता है। संवेदना और विचारों का एक साझा प्रभाव मन पर पड़ता है। इस दृष्टि से तरुण की कहानियों पर एक ही समय में दो अलग ढंग से एक साथ बात की जा सकती है। एक ओर तो उन कहानियों में व्यक्त विचारों के मद्देनजर और दूसरी ओर उनमें व्यक्त संवेदनाओं को केन्द्र में रखकर। इसलिए एक साथ उनकी कहानियों में व्यक्त विचारों से तो सहमत और असहमत हुआ जा सकता हैं, पर संवेदना के धरातल पर कहानी उनके पक्ष में ज्यादातर मौकों पर जिरह करती है।
तरुण भटनागर की कहानियों की शुरुआत महज शुरुआत भर नहीं होती। वह जहां शुरु हो रही होती हैं, उससे पहले भी एक कहानी मौजूद रहती है और उसके बाद भी। इस तरह से हर कहानी उनके लिए एक 'प्रस्थान-बिन्दु' की तरह है और हर कहानी के साथ वे अपने समय-समाज के अतीत, वर्तमान और भविष्य में प्रस्थान कर जाते हैं। उनकी चिंता के सूत्र अतीत और वर्तमान में कहीं भी पैवस्त हो सकते हैं और उनकी चिंता में वर्तमान और भविष्य कभी भी हो सकते हैं। बावजूद इसके उनकी चिंता के केन्द्र में उनका 'समकाल' ही है। यही कारण है कि उनकी कहानियों में देश और काल का एक स्पष्ट बोध अनवरत देखने को मिलता है। देश-काल का यह स्पष्ट बोध तरुण को इस पीढ़ी के कहानीकारों में एक अलग पांत में खड़ा करता है। तरुण की कहानियों में व्यक्त समकालीनता को सहजता से पहचाना भी जा सकता है। पर इस समकालीनता को पहचाने जा सकने लायक बनाने के लिए वे जो संदर्भ बिन्दु या प्रस्थान बिन्दु चुनते हैं, वे प्रस्थान बिन्दु या चुनाव के क्षण एक खास नुक्ते की तरह उनके बाद की कहानियों में आते हैं। आगे यथाप्रसंग इसकी चर्चा की जायेगी।
तरुण भटनागर का पहला कहानी संग्रह 'गुलमेंहदी की झाडिय़ां' का प्रकाशन 2008 में हुआ। इसमें उनकी सात कहानियां शामिल थीं। इनमें से 'हैलियोफोबिक' को छोड़कर अन्य छह कहानियों को एक श्रेणी में रखा जा सकता है। जिसमें बतौर कहानीकार तरुण के उठान को देखा जा सकता है। 'हैलियोफोबिक' से उनके कहानी लेखन में एक 'शिफ्ट' दिखता है। शिफ्ट; कहन की भंगिमा, कथ्य के चुनाव और कथ्य के शिल्प के धरातल पर। इस 'नरेशन', 'क्राफ्ट' और 'कंटेन्ट' के स्तर पर एक पहचाने जा सकने लायक 'पैटर्न' को तरुण की कहानियों में लक्ष्य किया जा सकता है। किन्तु इस 'शिफ्ट' पर आने से पहले तरुण की शुरुआती कहानियों पर थोड़ी बात लाजिमी है।
यों तो तरुण की पहली छपी कहानी 'धूल की परत' थी, पर पहली लिखी कहानी 'गुलमेंहदी की झाडिय़ों' थीं, जो उसके बाद छपी थी। 'धूल की परत' उनकी अब तक प्रकाशित दोनों कहानी संग्रहों में अनुपलब्ध है। इसलिए बात 'गुलमेंहदी की झाडिय़ों' से ही शुरु करता हूं। शुरुआत की लिहाज से 'गुलमेंहदी की झाडिय़ों' में कई ऐसी बातें हैं जिसकी वजह से उसे नोटिस किया जाना बनता था और उसकी नोटिस ली गई। झुग्गियों के बचपन को यह कहानी 'दर्शाती' है। 'दर्शाती' को अलग से चिन्हित करने की वजह यह है कि इस कहानी में दृश्यात्मकता काफी है। शुरुआती कहानी होने की दृष्टि से इसमें उपलब्ध दृश्यों के माध्यम से कहानी को कह सकने की क्षमता रेखांकित करने योग्य है। झुग्गियों के जीवन में रोजमर्रे की जरुरतों के लिए जो संघर्ष करना पड़ता हैं, उससे बचपन किस कदर चोटिल हो जाता है, कहानी उसे दिखाती है। 'परिवेशजन्य त्रासद स्थितियों' के छोटे-छोटे क्षणों को जोड़ कर त्रासदी के एक बड़े रुप को तरुण रचते हैं। यह आगे चलकर उनकी कहानियों की एक खूबी के बतौर विकसित होता है। केवल अंत त्रासद नहीं, बल्कि आद्यन्त त्रास की छाया में कुम्हलाये हुए जीवन की कहानी बयां करना तरुण को भाता है। 'अभावग्रस्तता' शब्द के मायने इस कहानी को पढऩे के बाद थोड़े बेहतर तरीके से हमारे सामने खुलते हैं। अभाव जीवन को कैसे अपना ग्रास बनाता है? और अभाव जब जीवन को ग्रसता है, तो बेहद निजी आत्मीय समझे जानेवाले सम्बन्धों के मध्य भी किस कदर कंटीली झाडिय़ों-सी (गुलमेंहदी की झाडिय़ां) उग आती हैं। कहानी एक कचरा बीनने वाली लड़की और उससे कम उम्र के होटल में बर्तन साफ करने वाले लड़के सुन्दर की है। जब लड़के को 'चाइल्ड लेबर एक्ट' के अंतर्गत होटल से निकाल दिया गया तो दोनों मिलकर कचरा बीनने लगते हैं। उन दोनों को 'चाइल्ड लेबर' का मतलब पता नहीं है, बस इस शब्द के कारण सुन्दर चिढ़ता है सो वह उसे 'चाल्ड लेबर' कह कर मौके-बेमोके छेड़ती रहती हैं। रोज जरुरत भर कचरा चुनने का दबाव उनके बचपन पर इस कदर हावी है कि उसकी सगी मां उसे जल्लाद-सी लगती है। खाली बोरा लेकर आने पर उसकी मां उसे झोंटा पकड़कर मारती है, राँड और स्साली जैसी गालियां देती है। वह भी अपनी मां को चांडालिन औ जल्लाद कहती-समझती है। ''वह सोचती है पर वह जानती है, वह छेटी है। वह मां से लड़ नहीं सकती एक दिन तो उसे मां पर इतना गुस्सा आया कि उसने मां को पत्थर उठाकर मार दिया और भाग गयी। पर कुछ समय बाद उसे वापस झुग्गी आना पड़ा। उस रोज वह जान गयी थी कि वह भाग कर नहीं जा सकती है। उसे हर बार वापस आना है और मां की गालियां, फटकार और मार सहनी है।... उसने सोचा है कि जब वह बड़ी हो जाएगी, तब मां को छोड़कर चली जाएगी। अपनी अलग झोपड़ी ले लेगी। पर मां के पास नहीं रहेगी।'' (गुलमेंहदी की झाडिय़ां, भारतीय ज्ञानपीठ, पृ. 41) यह रोजमर्रे की कहानी है। इसका कोई हल नहीं है। झुग्गियों में व्याप्त अभाव की इस गाथा की मार्मिकता कई अवसरों पर कचोटती है। जैसे एक है ''वह पूरी गर्मी मां से चप्पल के लिए जिद करती रही। उसने मां से चप्पल के बहुत जिद की। तब जाकर उसे नयी चप्पल मिल पायी। बरसात बाद उसे मां ने नयी जोड़ी लाकर दी।'' (वही, पृ. 41) या फिर कभी-कभी स्कूल के बच्चों की पोयम की आवाज रेलवे यार्ड तक आती है। कभी-कभी वह और सुन्दर उस आवाज को ध्यान से सुनकर जानने की कोशिश करते हैं कि वे क्या गा रहे हैं। उसे कोई पोयम वाला गाना नहीं आता है। कुछ फिल्मी गाने आते हैं। खासकर शाहरुख खान की फिल्मों के गाने। (वही, पृ. 50) कहानी जहां खत्म होती है, वह आखिरी हिस्सा यूं है कि ''वह देर रात तक जागती रही। उसकी भूख बढ़ गयी थी और उसका खुद से किया वादा पक्का होता जा रहा था। ...हां, वह नहीं सोचेगी। काम करते समय स्कूल वाली बात तो वह बिलकुल नहीं सोचेगी। कोई बात नहीं। कोई सपना नहीं। वह कुछ नहीं गुनेगी। सपने देखने से खुशी तो होती है... पर काम छूट जाता है, मां की मार पड़ती है, रात भर भूखा सोना पड़ता है। सपने देखने से बड़ी तकलीफें होती हैं। उसका विश्वास पक्का हो गया था। उसी की गलती है। अब वे कचरा बीनते समय वह कोई सपना नहीं देखेगी।'' (वही, पृ. 53) यह कहानी एक स्तर पर उस 'अयाचित यातना' (अनडिजव्र्ड सफरिंग) को दर्शाती है जिसके हकदार वे बच्चे नहीं हैं, उनकी जन्मगत परिस्थितियां हैं। वे फकत अपनी पैदाइश के कारण गुलाम हैं ('प्रिजनर्स आफ बर्थ इन सम सेन्स')। रेखाचित्र खींचने में जैसे चरित्रों के साथ पेश आया जाता है, इस कहानी में बच्चों के चरित्रों के अंकन में कुछ वैसा ही साम्यताओं को लक्ष्य किया जा सकता है। कहानी को पढ़ें तो पहली बार में समझ नहीं आता कि इसका शीर्षक 'गुलमेंहदी की झाडिय़ां' क्यों रखा गया? पर कहानी के बीच में ही नामालूम से लगने वाले इन वाक्यों पर गौर करें कि ''गुलमेंहदी की झाडिय़ां'' क्यों रखा गया? पर कहानी के बीच में ही नामालूम से लगने वाले इन वाक्यों पर गौर करें कि ''गुलमेंहदी के छोटे-छोटे फूल रेल की पटरी और गिट्टी के ढेर के इर्द-गिर्द फैली झाडिय़ों पर ठुमक रहे थे। एक ही गुच्छे में कई छोटे-छोटे पीले-लाल फूल। पर इन फूलों को कोई उगाता नहीं है। कोई इनकी माला नहीं बनाता। कोई इन्हें भगवान पर नहीं चढ़ाता...। पता नहीं क्यों? उसे समझ नहीं आता। पता नहीं क्यों लोग ऐसा करते हैं?'' (वही, पृ 50) इन वाक्यों का मिलान उन बच्चों के जीवन से करने पर गुलमेंहदी की झाडिय़ां एक स्तर पर उन बच्चों का ही रुपक जान पड़ती हैं।
बच्चे दुनिया को अलग ढंग से देखते और आब्जर्व करते हैं। वे हर मसले में एक अलग सन्दर्भ बिन्दु की तरह होते हैं। इस दृष्टि से तरुण की एक कहानी है 'कौन-सी मौत'। हमारे जीवन में छवियों का निर्माण कैसे होता है? उन छवियों को जब हम विकसनशील मानसों पर अनजाने थोपने की कोशिश कर रहे होते हैं, तो वे किस ढंग से उन मसलों पर सोच रहे होते हैं। यह कहानी बड़ी दूर से उस बिन्दु तक का सफर तय करती है। पिता पुत्र के सम्बन्धों से इतर यह कहानी मृत्यु के मसले पर भी इस जरुरी तथ्य को रेखांकित करती है कि मृत्यु एक अत्यन्त निजी प्रसंग है। किसी के मौत पर ईमानदार चेतनाओं की प्रतिक्रियायें उनके साथ निजी सम्बन्धों से चालित होती हैं।
मृत्यु और मार्मिकता दोनों के संतुलन से 'फोटो का सच' आकार ग्रहण करती है। एक बूढ़े पिता के जवान फौजी बेटे की मौत पर मिलने वाले सरकारी मुआवजे को लेकर की जाने वाली भाग-दौड़ के बीच बूढ़े पिता के दुखों के स्राव की दास्तान है। इस कहानी के दो छोर हैं। एक छोर पर उस मृत्यु का लेनदार यानी जीवेन्द्र के बूढ़े पिता है और दूसरे छोर पर सरकारी महकमें का एक मामूली किरानी। इन दोनों छोरों की विभाजक रेखा जीवेन्द्र की मौत है। मौत के पाले में बूढ़ा पिता अपने बेटे की यादों के साथ खड़ा है। और दूसरे पाले में इस मौत से उदासीन सरकारी महकमा। पर ऐसा नहीं है कि सरकारी महकमे की इस उदासीनता से उसके प्रति हमारे मन में कोई रोष पैदा होता हो। कहानी का मकसद सरकारी तंत्र की असंवेदनशीलता का रेखांकन नहीं है। बल्कि बूढ़े बाप के अकेलेपन और मृत्यु से उपजे अवसाद को साझा कर सकने के ठौर की तलाश है। 'कौन-सी मौत' में मौत के मायने समझाते हुए तरुण ने लिखा है कि ''मरना यानी एक अन्तहीन अकेलापन... जो दूसरे अकेलेपन की तरह कभी समाप्त भी नहीं होता है। एक बेइलाज शास्वत अकेलापन, जिसका नाम मरना है।'' (वही, पृ 92) जीवेन्द्र के पिता के पास ऐसी कई तस्वीरें हैं जो ये साबित कर सके कि वे ही जीवेन्द्र के पिता हैं। ''पर फिर भी वे दूसरी फोटुएं ले आये। उनका मन हुआ कि वे इन्हीं फोटुओं को ले चलें। वे बस इन्हीं फोटुओं को ले जाना चाहते थे। ये फोटुएं उनकी पसन्दीदा फोटुएं जो हैं। फिर उन्होंने अर्से से इन फोटुओं को नहीं देखा देखा था। इन फोटुओं पर किसी से बात नहीं की थी। उनका मन हो रहा था कि इन फोटुओं को वे किसी को दिखायें। किसी से इन फोटुओं पर बात करें। अगर जीवेन्द्र मरा नहीं होता और शालिनी इस तरह दुखी नहीं हुईं होती कि पूरा समय चुप बनी रहे, तो वे शालिनी से बात करते।'' (वहीं, पृ. 87)
'गुणा-भाग' सपेरों के परम्परागत पेशे के जीवन-यान के पेशे के बतौर चूक जाने की कहानी है। सर्पदंश से होने वाले मौतों के लिए घोषित सरकारी मुआवजे के लोभ में सांप से डसवा कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेने की यह कहानी भी सभ्यता के विकास के साथ परम्परागत पेशों से बेदखली की कहानी है। काका के पास दूसरा विकल्प नहीं बचा है। आखिर वह क्या करें? ''जब घर में चूल्हा नहीं जलता है और पतोहू रात को चुपके से सो जाती है... कहो कि मैं उससे रोटी न मांग लूं।'' (वही, पृ. 26)
हम समय का बीतना सुनते आये हैं, पर शहर का बीतना थोड़ा काव्यात्मक लगता है। एक शहर जो बीत चुका हो उससे गुजरने के मायने क्या हैं। कहानी इसे ही बयां करती है। ''कोई और शहर होता तो अब तक मर चुका होता। कई दूसरे शहर भी हैं, जहां मैं रहा हूँ और जिन्हें मैं छोड़ चुका हूं। वे सारे शहर मर चुके हैं। बीते शहरों में से बस यही एक शहर अभी तक जिन्दा है।'' (वही, पृ. 58) क्योंकि उस शहर से पुराने दिनों किये गये प्यार की यादें जुड़ी हैं। गर वह नहीं होती तो 'यह बीता हुआ शहर होता। उन बीते शहरों मे से एक जहां जाने का कोई कारण नहीं बचा है।'  स्मृतियां भी आबाद करती हैं, स्मृतियां भी विस्थापित करती हैं। पूरी कहानी में 'वह' की जो सार्वनामिकता है, वह उसे धारण करनेवाली संज्ञा पर भारी है।
'हंसोड़ हंसुली' तरुण के पहले कहानी संग्रह और संभवत: बाद में प्रकाशित होने वाली कहानियों में भी सर्वाधिक लम्बी कहानी है। पर इस कहानी की शुरुआत ही झारखण्ड के भूगोल के सन्दर्भ में इस तथ्यात्मक भूल के साथ होती है कि ''झारखंड में छोटा नागपुर पठार की राजमहल पहाडिय़ां।'' (वही, पृ 109) चाहें तो इस एक पंक्ति के आधार पर इसे 'आम्र्ड चेयर राइटिंग' का खराब उदाहरण कह कर खारिज कर दिया जा सकता है। पर इसे दरकिनार कर दें तो यह कहानी में औपन्यासिकता के गुणों को धारण किये हुए है। इसमें बाबूजी और उनके लड़इय्यों का चरित्र यादगार बन पड़ा है। पर इस संग्रह की इन कहानियों की तुलना में 'हैलियोफोबिक' कहानी इसलिए तरुण की कहानी यात्रा में एक पड़ाव की तरह अलग से रेखांकित किये जाने योग्य जान पड़ती है कि इस कहानी में विन्यस्त शिल्प का दुहराव या विस्तार उनके बाद की लगभग प्रत्येक कहानी में देखने को मिलता है। आखिर वह कौन-सी शिल्पगत विशिष्टतायें हैं जो तरुण के बाद की कहानियों में लगभग एक पहचान की तरह मौजूद हैं?
'हैलियोफोबिक' से तरुण भटनागर अपनी कहानियों में 'प्रत्यक्षीकरण' (जक्स्टापोजिशन) को एक कहानीगत प्रविधि के तौर पर बेहद सचेत स्तर पर उपयोग में लाना आरंभ करते हैं। इस जक्स्टापोजिशन से उपजी समांतरता (पैरललनेस) तरुण की कहानियों की एक विशिष्टता है। 'हैलियोफोबिक' से उनकी कहानियों में समांतरता का यह जो आग्रह बढ़ता है इसे उनकी 'शिल्पगत जिद' के बतौर भी देखा-पढ़ा जा सकता है। समांतरता को कहानी में बरतने की उनकी तरतीब कुछ ऐसी है कि वे किसी भी देश-काल अर्थात संसार के किसी भी भू-भाग में घटित किसी तथ्य सम्मत घटना को अपनी कहानी का संबोध्य बना देते हैं और उसके समांतर या उसके परिप्रेक्ष्य में किसी अन्य देश-काल में घटी किसी अन्य घटना को रख देते हैं। इस संदर्भ में 'भूगोल के दरवाजे पर', 'पतलून में जेब', 'दादी मुल्तान और टच इन गो', 'द रॉयल घोस्ट', 'सब्जेक्ट: फ्लैट टू थर्टी वन', 'श्रद्धांजलि: एक अमेरिकी मौत पर', 'लघु-गुरु-लघु' को देखा जा सकता है। जिसमें कहानियां समांतर स्तरों पर चलती हैं। कथ्य की इस समांतरता के नेपथ्य में कहानी का जो अभिप्रेत होता है, उसकी साभिप्रायता ध्वनित होती रहती है। इस समांतरता वाली प्रविधि में निहित साभिप्रायता का प्रभाव पाठकों की बौद्धिक क्षमता पर निर्भर करता है। तरुण की इस शिल्प की कहानियों में 'मास अपील' पैदा करने की क्षमता कम है। एक सीमित वर्ग तक ही यह कहानियां संप्रेषित हो पाती हैं। संप्रेषण के दायरे के सिमटने के दूसरे अन्य कारण भी तरुण के यहां देखे जा सकते हैं। उनमें से एक है, उनकी कहानियों में व्यक्त ध्वन्यात्मकता; दूसरा, समांतरता के कारण बीच की फांक को न भर सकने की पाठकीय क्षमता; तीसरा कहानीपन की कीमत पर विचारों की आवाजाही। ध्वन्यात्मकता को उनकी बस्तर की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियों ('लार्ड इर्विन ने इग्नोर किया', 'ढिबरियों की कब्रगाह', 'चांद चाहता था, कि धरती रुक जाये') में बेहतर ढंग से देखा जा सकता है। पर इसके जो परिणाम सामने आये हैं। उसमें कामयाबी और नाकामयाबी दोनों तरुण के हिस्से आये हैं। जहां इस समांतरता के मध्य कहानी का प्रवाह बना रह गया है और कहानी अपने उद्गम से मुहाने तक बिना किसी अवरोध के पहुंच गई है, वहां तरुण कामयाब रहे हैं। और जहाँ ऐसा नहीं कर सके हैं, वहां उनके हिस्से नाकामयाबी हाथ आई है। 'भूगोल के दरवाजे पर', 'दादी मुल्तान और टच इन गो', 'द रॉयल घोस्ट' और 'पतलून में जेब', लगभग एक किस्म की साहित्यिक युक्तियों की मदद से लिखी गई कहानियां हैं। पर जहां पहले तीन मौकों पर वे कामयाब हैं, वहीं आखिरी मौके पर नाकामयाब। इस नाकामयाबी के मूल में कथ्य को शिल्प के खांचें में बखूबी न उतार पाने की चूकें हैं। कथ्य अैर कहन के ढब पर आवयविक एकरुपता या संरचनात्मक अन्विति (स्ट्रक्चरल यूनिटी) के अभाव में यह कहानियां निष्प्रभावी साबित होती हैं। इसे उनकी कहानियों के मार्फत् ही समझते हैं। जैसे तरुण के यहां फोटो एक चरित्र के बतौर कई मौकों पर व्यवहृत हुआ है। फोटो को तरुण भटनागर की कहानियों में प्रयुक्त होनेवाली एक रूढि़ या साहित्यिक युक्ति बतौर भी प्रस्तावित किया जा सकता है। फोटो की केन्द्रीयतावाली तीन कहानियों का जिक्र कर रहा हूं। 'फोटो का सच', 'श्रद्धांजलि: एक अमेरिकी मौत पर' और 'गुरु-लघु-गुरु'। यों तो मेरी नजर में इनमें सबसे बेहतर 'श्रद्धांजलि: एक अमेरिकी मौत पर' है, पर मार्मिकता की कसौटी पर 'फोटो का सच' को भी शामिल किया जा सकता है। पर 'गुरु-लघु-गुरु' में तरुण कहानी के विषय को, उसकी ऐतिहासिकता को स्थापित करने में जितना स्थान घेरते हैं उससे कहानी एक अतिकथन का शिकार हो जाती है।कहानी में जो कसावट होनी चाहिए उसकी जगह एक बिखराव (फैलाव नहीं) घर कर जाता है।
तरुण भटनागर की जो कहानी लेखन की शैली है, उसमें एक अतिकथन और बिखराव के खतरे हमेशा मौजूद रहनेवाले हैं। उसकी सबसे बड़ी वजह उनकी 'कहानी विषयक अवधारणा' में ही निहित है। मतलब यह कि तरुण कम से कम दो स्तरों पर संतरण करने वाली कहानियां लिखने के अब अभ्यस्त हो चुके हैं। 'समान्तरता' के शिल्प वाली इन कहानियों के कुशल निष्पादन में हर बार उसके कथा तत्वों के बीच एक सूक्षता अथवा आवयविकता का अचूक निर्वाह शामिल है। ऐसा न होने की स्थिति में कहानियों के फकत एक प्रायोगिक नमूने में तब्दील हो जाने के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता है।
तरुण भटनागर की कहानियों की एक बड़ी खासियत उनका विषय, परिदृश्य या थीम केन्द्रित होना है। अपनी कहानियों के पहले वे एक टेक चुनते हैं, जिसे हम संदर्भ बिन्दु कह लें, फिर उससे कथानकों की दो पगडण्डियां निकालते हैं। एक मुख्य कथानक होता है और दूसरा गौण सा जान पडऩे वाला जो पूरी कहानी के दौरान यथाप्रसंग आता-जाता रहता है। कहानी के आरंभ में ही एक रहस्य के आगे खुलासे की बात कर दी जाती है, जिससे रोचकता लगभग अंत तक बनी रहे। उसके बाद वांछित विषय, परिदृश्य या थीम के सन्दर्भ को ज्यादातर मौकों पर इतिहास के पन्नों से पुष्ट करने का एक उपक्रम होता है। यह कहानी का वह हिस्सा होता है, जहां तरुण अपना मंतव्य रखते हैं। यह हिस्सा उनकी विषयगत तैयारी के अनुरुप दीर्घ, सुदीर्घ, नातिदीर्घि हो सकता है। यहां वैसे विचार जो विमर्श शक्ल ले सकें इफरात में मिल सकते हैं। इस संदर्भ में एक बेहद जरूरी बात यह कि तरुण की कहानियों में उद्धृत कर सकने लायक विचार हर कहानी में मौजूद हैं। जो विशुद्ध विमर्शमूलक होते हैं। पर जिन कहानियों में यह हिस्सा आरोपित-सा जान पडऩे लगता है, वहां कहानी, कहानी न होकर कहानी-सी लगने लगती है। और ऐसा प्रतीत होता है कि हाल के दिनों में जो कथेतर गद्य लिखा गया है, उसकी एक बेहतर संभावना तरुण में है। तो फिर एक सवाल यह भी उठता है कि कहानी के आवरण में कहने की बजाय उसे दो टूक ढंग से साफ-साफ क्यों नहीं कहा जा रहा है? कहानी को बहाना क्यों बनाया जा रहा है। इसका जवाब मिला कथाकार रणेन्द्र से एक अनौपचारिक बातचीत में कि प्रशासनिक सेवा की सेवा संहिता में कई बंदिशें हैं, जिसके कारण फिक्शन के मार्फत् बातें करना ज्यादा सुरक्षित है। यह भी एक वजह रही है कि हिन्दी में प्रशासनिक अधिकारी 'फैक्ट्स' आधारित विधाओं की तुलना में अपने सेवाकाल में 'फिक्शन' जैसी विधाओं का चुनाव ज्यादा करते हैं और सेवानिवृत्त होने के बाद कुछ अलग विधाओं का।
आरंभिक कहानियों की तुलना में अपने एक दूसरे चरण में (समांतरता वाले में) तरुण भटनागर कहानियों के मार्फत् विचारों के लिए अवकाश का सृजन करते हैं। इस चरण में एक साथ कई बातों का समावेश तरुण अपनी कहानियों में करते हैं। एक तो कहानी के केन्द्र में किसी विचार को लाते हैं, उसे विमर्शमूलक बनाते हैं। विचार को विमर्शमूलक बनाने के लिए यथासंभव उसके ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक पहलुओं को गाहे-बगाहे सामने लाते हैं। पर विमर्शमूलक होने के बावजूद उन कहानियों को हमारे काम लायक बनाती हैं, उनमें व्यक्त संवेदनायें। जहां विचारों की शुष्कता ने संवेदनाओं की नमी को सोख लिया है, वैसी कहानियाँ थोड़ी बेमानी-सी जान पड़ती हैं। इस संदर्भ में एक बात और ध्यातव्य है कि कहानीपन की रक्षा के साथ उसे विमर्शमूलक बनाने की सबसे बेहतर क्षमता उदयप्रकाश में है। पर कहानी को विमर्शमूलक बनाने के उनके तौर-तरीकों पर विस्तार से फिर कभी।
तरुण यों तो गणित के साथ-साथ इतिहास में भी स्नातकोत्तर हैं। अपनी कहानियों में वे जिन्दगी के 'गुणा भाग' के पीछे के समीकरणों को जिस कदर हल करने में मुब्तिला हैं, समांतर रेखाओं की भांति जिस कदर कथानकों की समांतरता को साधने में लगे हैं, उन अवसरों पर कहानी में पडऩे वाले उनके गणितीय संस्कारों को लक्षित किया जा सकता है। पर इस गणितीय संस्कार का एक नुकसान उनको यह हुआ है कि उनके कहानी लिखने के फार्मूले या पैटर्न को भी पकड़ा और समझा जा सकता है। इतिहास कहानी के एक घटक के बतौर भी उनके यहां व्यवहृत होता है। इतिहास को कहानी में तरुण को बरतने का तरीका एक अजीब-सा मंजर पैदा करता है। वह यह कि इतिहास को वे इतना सप्रमाण अपनी कहानी में पिरोते हैं कि उसका फिक्शन वाला हिस्सा भी इतिहास के आलोक में कल्पनाप्रसूत नहीं बल्कि इतिहास ही जान पड़ता है। तरुण के यहां इतिहास से छिटके हुए लम्हों को पकडऩे की कोशिश नहीं है, बल्कि उन छिटके हुए लम्हों का इतिहास का हिस्सा बनाने की एक पुरजोर कोशिश है। समकालीन कहानी परिदृश्य में अलग-अलग अनुशासनों में दाखिल कहानीकारों के अपने संस्कारों ने इस भूमंडलोत्तर कहानी की पौध शाला को अपने ढंग से आबाद और रौशन किया है।
तरुण भटनागर की कहानियों में व्यक्त 'अंतरंगता और पक्षधरता' से उनकी विचारधारा की पहचान की जा सकती है। तरुण की विचारधारा के बारे में एक बात गौरतलब है कि उनके यहां माक्र्सवाद के विभिन्न संस्करणों की एक आलोचना देखने को मिलती है। जैसे 'हैलियोफोबिक' सोवियत रुस के द्वारा अफगानिस्तान पर किये गये हमलेकी पृष्ठभूमि को रेखांकित करता है। 'भूगोल के दरवाजे पर' तिब्बत पर चीन के द्वारा की जा रही ज्यादतियों को संबोधित करता है। 'चाँद चाहता था कि धरती रुक जाये' नक्सलवाद के लाल आतंक के प्रश्नों के दायरे में लाने का काम करता है। तो क्या इससे उनका माक्र्सवाद विरोध रुझान स्पष्ट होता है? इन कहानियों में जिन वर्गों,समुदायों या व्यक्ति के प्रति सहानुभूति और पक्षधरता प्रकट होती है, उसे देखते हुए तरुण को माक्र्सवादी विचारधारा का विरोधी नहीं कहा जा सकता है। इस 'एप्रोच' पर एक अलग संदर्भ से जरूरी बात रेखांकित करना चाहता हूं कि 1990 के बाद की कथा पीढ़ी में विचारधारात्मक आग्रहों के प्रति एक अंध-भक्ति की प्रवृत्ति देखने को नहीं मिलती है। पार्टी लाईन जैसी चीजें अब कथाकार का संस्कार नहीं रह गई हैं। किसी विचारधारा के अंतर्विरोधों को रेखांकित करने का साहस इनमें विकसित हुआ है। भूमंडलोत्तर पीढ़ी के कहानीकारों के 'ब्लाइंड स्पाट्स' भी बदल गये हैं। उन नये अंतर्विरोधों की पड़ताल का दायित्व भी समकालीन आलोचना पर है है। इसकी दरियाफ्त भी जारी है। आनेवाले समय में इस पर भी बात की जायेगी। और इस बदलाव के समाजशास्त्र को समझने की पृष्ठभूमि निर्मित की जायेगी।
विस्थापन की जितनी भंगिमायें (जड़ों में उखडऩे का दर्द, निर्मूल होने की तकलीफ, बेघर होने की पीड़ा) जितने अलग-अलग रुपों में तरुण की कहानियों में एक साथ दिखती हैं, वैसा उनकी पीढ़ी के दूसरे कहानीकार के यहां उस परिमाण में मौजूद नहीं है। निर्मूलता के इस विचार के साथ उनकी कहानियों में 'स्मृति' को भी एक विश्वसनीय साझीदार के रुप में देखा जा सकता है। मनोज रुपड़ा की भांति 'मृत्यु' को एक कथा तत्व के बतौर तरुण के यहां भी देखा जा सकता है। स्मृति, मृत्यु, निर्वासन, विस्थापन यह सब तरुण की कहानियों में परस्पर गुंथे हुए हैं। मनोज रुपड़ा की भांति ही इनकी कहानियों में भी हंसी के क्षण दुर्लभ हैं। भाषा के स्तर पर भी इन दोनों कहानीकारों के मध्य जो एक समानता है, वह है भाषा के मानकीकृत रुपों के इस्तेमाल का आग्रह। तरुण के यहां अपने कथ्य के अनुरुप भाषा में एक इत्मीनान, एक धीरज को रच सकने की अनकही-सी क्षमता है। 'शांत और संयत गद्य' है। कथानक के साथ कदमताल करती हुई भाषा है। औपचारिक-सी भाषा की एक सबसे बड़ी दुश्वारी होती है कि उसमें लोक की छौंक को नहीं महसूसा जा सकता है। मुहावरे और लोकोक्तियों सिरे से नदारद रहती हैं। तरुण मुहावरे और लोकोक्तियों की कमी को सादृश्यताओं से पाटते हैं। यह सचमुच प्रशंसनीय है। कुछेक उदाहरण रख रहा हूं। 'मुझमें एक साथ अलग-अलग जड़ों वाली कई बातें उग आयीं। और उनमें से एक बात कूदकर बाहर आ गयी जैसे भाड़ में सुनते पॉपकार्न में से कोई एक उछल जाता है।' (वही, पृ. 57) ''मैं प्रदर्शित करता रहा, जैसे चाइनीस चेकर की गोटी एक सोच के तहत एक गड्ढे से दूसरे गड्ढे पर कूदती रहती है।'' (वही, पृ. 66), ''जब भी वे ऐसा सोचते तो खुद को झटकारने का बेतुका-सा प्रयास करते, जैसे कीचड़ से सनी भैंस अपने शरीर को झटकारती है, पर एक बार झटकने के बाद उडऩे वाले कीट-पतंगें फिर से उसके शरीर पर आकर बैठ जाते हैं।'' (वही, पृ. 66) ऐसे दसों उदाहरण उनकी कहानियों से दिये जा सकते हैं। इतने उदाहरण रखने का एक आशय यह था कि हिन्दी कविता और कहानी की आलोचना में एक बहुव्यवहृत-बहुद्धृत वाक्य रहा है कि फलां कवि और कहानीकार ने अपना एक नया मुहावरा विकसित किया है। वह नया मुहावरा क्या हैं? इसकी चिंता किये बगैर एक ऐतिहासिक वाक्य व्यवहृद होता रहा है, बिना किसी आलोचनात्मक जवाबदेही के और बिना किसी पाठकीय जवाबदेही के। गर इस वाक्य का कोई अभिधात्मक आशय होता है तो तरुण भटनागर के संदर्भ में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। मुहावरे और लोकाक्तियों से पगी भाषा की झांकी इस पीढ़ी में पंकज मित्र के यहां देखी जा सकती है। पर जिनके भाषा का यह संस्कार नहीं है। उनके यहां भाषा में तरुण की तरह इस किस्म की रचनात्मकता को सचेत स्तर पर इस्तेमाल कम ही देखने को मिलता है। समकालीन जीवन की स्थितियों और मनोदशाओं की सादृश्यता को निरुपित करने के लिए 'जैसे' जो योजक चिन्ह बनाने का यह जो उपक्रम है, यह इस भूमंडलोत्तर पीढ़ी की कहानीगत भाषा की एक विशिष्टता के रुप में उभर रही है।
इन सबके बावजूद तरुण भटनागर की कहानियों पर बात करने की जो सबसे बड़ी वजह है, वह उनकी कहानियों की वह खासियत है, जो उन्हें इस पीढ़ी का अकेला कहानीकार बनाती हैं। उनकी कहानियों में अफगानिस्तान, तिब्बत, वियतनाम और मुल्तान के शरणार्थी न सिर्फ अपनी यातनाओं के साथ बल्कि ऐतिहासिकता के साथ मौजूद हैं। इंग्लैंड, अमेरिका, चीन, सोवियत रुस आदि अपनी करतूतों के साथ मौजूद है। मतलब अपनी राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक भूमिकाओं के साथ या कहें साम्राज्यवादी भूमिकाओं के साथ। भले ये सभी प्रस्थान बिन्दु की तरह हों पर उनके अनिवार्य सन्दर्भ के बतौर हम (भारत) मौजूद हैं। तरुण के लेखन में हदबन्दियों को मिटा देने की जो जिद है, उसके कारण उनकी कहानियों में इन देशों की सचेत उपस्थिति है। अगर इन कहानियों का अनुवाद अंग्रेजी में हो जाये तो संभवत: वे इस पीढ़ी के पहले 'काज्मपोलिटन' कहानीकार का दर्जा हासिल करेंगे। बहरहाल, मेरे लिए उनका 'काज्मपोलिटन' होना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना उनका हिन्दी में इन कहानियों को संभव करना। यद्यपि इस साल वे अपने दूसरे कहानी संग्रह 'भूगोल के दरवाजे पर' (राजकमल प्रकाशन, 2014) के साथ आये हैं। समांतरता की शिल्प वाली उनकी सारी कहानियां इस संग्रह में है और उनकी कहानियों पर एक सतत निगाह रखने के बाद यह कह सकता हूं कि उनके प्रतिनिधि शिल्प की यादगार कहानी आनी अभी बाकी है। तब तक के लिए आप उनकी 'गुलमेंहदी की झाडिय़ां', 'भूगोल के दरवाजे पर' और 'श्रद्धांजलि: एक अमेरिकी मौत पर' जैसी कहानियां पढ़ सकते हैं।

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