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जून 2014

पूर्ण सहमति तो एक अपवाद पद है

गजेन्द्र पाठक





हरीशचंद्र पाण्डेय की असहमतियों पर एक निबंध

'गोलमेज' में शामिल पारचून में अरूण कमल ने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की कविता संबंधी एक मशहूर मान्यता पर सवाल खड़ा किया था। आचार्य शुक्ल ने सभ्यता के विकास क्रम में कवि कर्म की बढ़ती मुश्किलों की जो बात की थी उसका प्रतिवाद करते हुए अरूण जी ने कवि कर्म को सभ्यता के हर चरण में एक मुश्किल काम माना है। वाल्मीकि, कालिदास, बाणभट्ट, भवभूमि या कबीर, जायसी, तुलसी के समय में भी कवि कर्म कोई सरल एवं सुविधाजनक विकल्प नहीं था। काव्य संसार में मुश्किलें कभी कम नहीं रहीं केवल उनका कायांतरण हुआ है। रामविलास जी ने वैदिक काल में देवताओं के कवि रूप पर विचार किया था और इस निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश की थी कि कवि और देवता एक समान आदर के पात्र थे। उनकी छवि में जो गिरावट आई वह बाद की देन है। हालांकि देवताओं के बारे में कवियों की राय बाद में कैसे बदली इसका प्रमाण तुलसीदास के 'रामचरितमानस' में ही मौजूद है -
''ऊँच निवास नीच करतूती
देख न सकहीं पराई विभूति।''
वाणी की देवी सरस्वती की जो यह दृष्टि देवताओं के बारे में है, उसे तुलसीदास जिस तरह प्रस्तुत करते हैं उससे देवताओं के बारे में भक्ति काल के कवियों की राय समझी जा सकती है। हालांकि इसके प्रमाण भक्तिकाल में अन्यत्र भी मौजूद हैं। ये कवि देवता नहीं बनना चाहते थे। चूंकि देवताओं की करतूत से वे परिचित थे। कवि छवि के इतिहासक्रम में भक्तिकाल के इन कवियों का यह प्रयास बेहद महत्तवपूर्ण है। देव और देवभाषा दोनों से असहमति के स्तर पर भक्ति कविता ने जो काम किया उस पर विस्तार की जरूरत यहाँ मैं नहीं समझता लेकिन इस संदर्भ की चर्चा, उसका स्मरण हरीशचन्द्र पाण्डेय के काव्य संग्रह 'असहमति' को पढ़ते हुए सहज रूप से हो जाता है। इक्कीसवीं सदी की असहमति निश्चित रूप से पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी से अलग है लेकिन असहमति और अस्वीकार का जो यह साहस है, उसका इतिहास पुराना है। कबीर को याद करें और कविता के उस बिरवे को सलाम करें जिसे एक उर्वर धरती के एक टुकड़े की तलाश थी। रेणु ने 'मैला आँचल' में डॉ. प्रशान्त की जन्म कथा का जो चित्र खींचा है उसे भी याद करें। जिस देश में सब कुछ जातियों से तय होता है, उस देश में किसी का वर्ण संकर होना क्या होता है इस पर कुछ कहने की जरूरत नहीं है। आचार्य हजारी प्रसाद ने कबीर पर ही विचार करते हुए भारतीय जाति व्यवस्था की उस विडम्बना की बात की थी जिसमें जाति व्यवस्था के निचले पायदान पर अवस्थित व्यक्ति भी वर्ण संकर को निकृष्ट समझता है। द्विवेदी जी से घनघोर असहमत रामविलास शर्मा ने भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था पर विचार करते हुए वर्ण संकरता को जाति व्यवस्था का एक आवश्यक सोपान माना था और मनुस्मृति के विश्लेषण के आधार पर ही यह सिद्ध किया था कि वर्ण संकरता अपनी विडम्बना के बावजूद एक नियम की तरह काम करती रही। रेणु ने डॉ. प्रशांत की जाति को लेकर जो सवाल उठाया था उसमें बिना जाति के आदमी को लावारिस लाश से भी बदतर माना था। नाम के बाद जाति पूछने वाले देश में या जातीय आधार पर आज तक राजनीति करने वाले देश में जाति की सच्चाई मुँह मोडऩे वाले तथाकथित बुद्धिजीवी जब आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास में साहित्यकारों की जाति या प्रेमचंद की रचनाओं में उनके पात्रों की जाति की सूचना से मुँह बिचकाते हैं तो मुझे उनके छद्म पर हँसी आती है। जाति छिपा लेने से अगर आधुनिकता सिद्ध हो सकती थी तो फिर कबीर से लेकर डॉ. प्रशान्त जैसे चरित्र से जाति पूछने के पीछे कौन सी लाचारी थी? बहरहाल, हरीशचंद्र जी के काव्य संसार में ऐसे बिरवों की विडंबना पर गहरा विचार हुआ है -
''चूंकि झाड़ी की ओट नहीं छुपाई जा सकती थी आवाज।
एक किलकारी उसका वहाँ होना बता ही गयी
झाड़ी न होती तो कोई नाला होता या ताल
मिल ही जाता है ऐसे नवजातों को अपना कोई लहरतारा।''
सीता जनक को खेत में मिलीं, कबीर नीमा को लहरतारा के किनारे और डॉ. प्रशांत स्नेहमयी को कोसी की लहर पर। लेकिन जब वे सीता, कबीर और प्रशांत नहीं थे तब 'कुँवारे मातृत्व के ये फूल' किसी गोद में फल बनने के लिए जीवन और मृत्यु की जिस क्षीण रेखा पर अवस्थित थे उस अनमोल और विशिष्ट क्षण में -
''पास से गुजरती एक निराश कोख में अजीब सी हूक उठी है।
एक उदास नाभि थरथरायी है। एक लिथड़ी नाल को देख।''
उदास नाभि की यही हूक जो 'नाम' तय करती है वह नाम कोई सामान्य नाम नहीं है। यह वह नाम नहीं है जिसे कोई निरर्थक कह दे या कोई हास्यास्पद सिद्ध कर दे। बल्कि यह नाम उस अयाचित और संदिग्ध जीवन को पहला 'लाइफ सर्टिफिकेट' है-
''नाम जैसे कोई उर्वर बीज
एक बीज को नम जमीन मिल गयी है
धँस रहा है वह
अँकुरा रहा है वह।''
इसी नाम से उसे अब जाना जाता है और मुझे पूरा विश्वास है कि भवभूति ने कविता में शब्दों के अंकुरण की प्रक्रिया ऐसे ही जीवन के अंकुरण से सीखी होगी। यही अंकुरण जब परजीवी लता से तनादार वृक्ष बनने की कोशिश में अपनी जाति से बेखबर अपने नाम की ध्वनि को पकडऩे की कोशिश करता है और इस ध्वनि के संगीत को पकडऩे की कोशिश में उधर मुड़ रहा है जिधर से आवाज आ रही है। लेकिन 'नाम के धुएँ' के साथ वह जिस 'आग' तक पहुंचने की कोशिश करता है उसे देखे जाने की जरूरत है -
''अपने नाम के साथ एक बच्चा सयाना हो रहा है
और सयाना होगा और समझदार
इतना कि वह नफरत कर सकेगा दूसरे नामों से
नाम को सुनकर आज उसने कई घर जलाये हैं
नाम सुनकर आज उसने कई छोड़ दिये हैं।''
कविता में मितकथन की ताकत से हम परिचित हैं। गालिब और निराला से हमने यह संस्कार अर्जित किया है कि कम शब्दों में महा काव्य की संभावना कैसे पैदा की जाए। हरीशचन्द्र जी की कविताओं में यह विशिष्ट संस्कार मुझे प्रभावित करता है। कारक भेद में संज्ञा का स्थान सबसे ऊपर माना गया है। संज्ञा में नाम की भूमिका दोनों जगह कितनी महत्वपूर्ण, इस कविता के खत्म होते होते हम स्वीकार कर सकते हैं।
नाम के आधार पर चलने वाले व्याकरण और इस दुनिया में छोटी और बड़ी तथा उपयोगी और अनुपयोगी की श्रेणीबद्धता से भी हम भलीभांति परिचित हैं। ऐसी ही एक छोटी संज्ञा और छोटे जीवन का नाम है 'चींटी'। इस चींटी पर दो कविताएं हैं। कबीर की एक कविता है -
''चींटी के पग नेवर बाजत
सो भी साहब सुनता है।''
वह साहब कितना बड़ा होगा जो चींटी के पैर के पायल की आवाज सुनता होगा। कबीर जैसों के साहेब बहरे नहीं हो सकते। जो ऊँची से ऊँची आवाज को सुनने की इच्छा नहीं रखते उनसे इस छोटी ध्वनि को सुनने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। तुलसीदास ने जब लिखा कि -
''गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न
बंदउँ सीता राम पद जिनहिं परमप्रिय खिन्न।''
तब वे भी कबीर की तरह यही बात कह रहे हैं। शुरूआत की है समुद्र और लहरों से। समुद्र और लहरों की आवाज में 'खिन्न' की आवाज, उदास लोगों की आवाज दबकर मर जाने वाली आवाज है। तुलसी को ऐसे राम नहीं चाहिए, जो इन उदास आवाजों को सुनने की इच्छा नहीं रखते हों। ये उदास और छोटी चीजें ऐसे ही इतिहास से बेदखल होती रही हैं -
''गुलाब के तने से होते हुए पंखुडिय़ों में टहलकर वे
लौट भी आयीं और पेड़ को पता तक नहीं चला
वे ऐसे ही टहलती हैं।
संभावना कहां-कहां नहीं ले जाती है।''
पूरी दुनिया के इतिहास को उठाकर देखें तो यात्रा और पलायन दोनों की जड़ में मीठा पाने और मीठा से दूर भगाये जाने की क्रमश: मीठी और कड़वी स्मृतियाँ याद आएँगी। 'मीठी' जो न कराये। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के उत्कर्ष काल में उत्तर प्रदेश, बिहार से मजदूरों के दल मॉरीशस और सूरीनाम जैसे अज्ञात देशों में पानी के जहाज में भर भरकर कर ले जाए गए। हिंदी के समकालीन कवि बद्रीनारायण ने आरा में इन तमाम देशों के लोक कलाकारों को आमंत्रित किया था जिनकी स्मृतियाँ भोजपुरी भाषा से जुड़ी हुई थीं। एक ऐसे ही कलाकार ने एक गीत सुनाया था जिसका आशय यह था कि गरीबी ने उनके पूर्वजों को जिस कठिन विकल्प के सामने खड़ा कर दिया था वह कितना यातनामय था। समुद्र की उल्टियाँ और साँप और बिच्छी से लदे बीच जंगलों से गुजरने के बाद कॉफी तोडऩे के लिए उनके पुरखे ले जाए गए थे। वही कॉफी जिसे पीते हुए 'कॉफी हाउस' में सभ्यता, संस्कृति, साहित्य और महापुरुषों की चर्चा होती रही है।
मीठी चीज के पीछे छिपी कड़वापन को हरीशचन्द्र ने इस कविता में याद किया है -
''मीठा-सा कुछ हो नहीं
चींटियों को जाना ही है वहाँ
रस्ते में खाली हाथ लौटती चींटियों को देख लौट
नहीं आता है
न होने को अपनी आँखों से देखता है
और होने को तो चखना ही है।''
उनकी एक कविता में जिसमें जहरखुरानी का चित्र है परदेश से लौटते मजदूरों के साथ ठगों द्वारा छल का चित्र। जो परदेश की हर कड़वी यातना से बचते-बचाते कुछ कमाकर लौट आए वे 'अपनेपन' के बिस्कुट खाकर शहीद हो गये। जिन्होंने इन बिस्कुट खाकर टूटे या शहीद हुए मजदूर यात्रियों को या उनका शव देखा हो उन्हें यह कविता एक नए धरातल पर ले जाती है। जहां ये चींटियाँ, ये मजदूर और बहुत पहले मॉरीशस-सूरीनाम गए मजदूर एक ही कतार में खड़े नजर आते हैं। 'इधर है आजमगढ़' कविता के पास चलिए। 'आजमगढ़' अब न तो नूर मुहम्मद के नाम से जाना जाता है और न ही राहुल सांकृत्यायन या कैफी आजमी के नाम से। आज आजमगढ़ कहकर देश के किसी भी कोने में किराये का एक अदद कमरा पाने में भी कामयाब नहीं हो सकते हैं। ट्रिनिडाड के पूर्व प्रधानमंत्री जिनके पूर्वज कभी आजमगढ़ छोड़कर गिरमिटिया मजदूर बनकर गए थे उनके आजमगढ़ आने पर यह कविता है -
''बिके हुए जानवर को क्या मालूम
कि उसे कहाँ ले जाया जा रहा है
उन्हें तो नहीं मालूम था कि उनका जहाज
कहाँ जा रहा है...
जहाज समन्दर को चीर रहा था
माटी का अलगाव उनकी छाती को
ब्याही बेटियाँ अगर परदेश गयी थीं
तो वे कहाँ जा रहे थे अनब्याही बेटियों के साथ''
ये सैकड़ों वर्ष बाद भी पीढिय़ों की स्मृतियाँ हैं जो उनके पूर्वजों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं लेकिन ये पूर्वज हरीशचन्द्र जी के शब्दों में 'समय और श्रम' की जुगलबंदी को न सिर्फ पहचानने वाले लोग थे बल्कि वे इसके सकर्मक प्रतीक हैं जिसके बल पर उन्होंने एक पराई धरती को गन्ने की खेती से स्वर्ग में तब्दील कर दिया। ऐसा स्वर्ग जो अपने मीठे रस से देवताओं के लिए भी स्पृहणीय हो जाए।
ये वही लोग थे जो गाय, भेड़, बकरियों की तरह ठूसकर जहाजों से भेजे गये थे और जिनके लिए -
''आया होगा
केप ऑव गुड होप उनके रास्ते में भी
लेकिन वे वास्को डी-गामा नहीं थे।''
वास्को-डिगामा और कोलम्बस किसी गुलाम देश में पैदा नहीं होते। जो अपनी धरती पर ही दूसरों की गुलामी करने को अभिशप्त हों वे दूसरी धरती की खोज कैसे कर सकते हैं? लेकिन इतिहास करवट लेता है और इसी ऐतिहासिक करवट में पराये देश में गुलामी करने को अभिशप्त पूर्वजों के -
''जो कभी समन्दर से गये थे
वे आकाश से लौट रहे हैं आज
जिन्हें पता नहीं था जहाज का रूख
वे बता रहे हैं अपने पायलट को
- इधर चलो
इधर से आ रही है खुशबू की बयार
इधर है आजमगढ़....''
निराला जी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की तरह कवि के मानसिक धरातल पर पहुंचने की कोशिश करते थे और उसमें यह बात मायने रखती थी कि कवि किस कोठे से बोल रहा है? हरीशचन्द्र जी के इस काव्य संग्रह का नामकरण जिस कविता से जुड़ा हुआ है उस कविता को देखें तो यह बात समझ में आएगी। बमियान में बुद्ध प्रतिमा और अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के संदर्भ से जुड़ी हुई यह कविता हमें जहाँ पर ले जाती है उससे यह पता चलता है कि कवि किस कोठे से बोल रहा
है -
''इन्हें तोडऩे में कुछ ही घंटे लगे
बनाने में महीनों लगे होंगे या फिर वर्षों
पर उन्हें बचाए रखा गया सदियों-सदियों तक
लोग जानते हैं इन्हें तोडऩे वाले के नाम जो गिनती में था
लोग जानते हैं इन्हें बनाने वालों के नाम जो कुछ ही थे
पर इन्हें बचाये रखने वालों को नाम से कोई नहीं जानता
असंख्य-असंख्य थे जो
पूर्ण सहमति तो एक अपवाद पद है
असहमति के आदर के बिना भला कौन बचा सकता है
किसी को इतने लम्बे समय तक।''
सहमति और असहमति के इतिहास और समाजशास्त्र पर यह एक गंभीर टिप्पणी है। जो लोग 'बहुजन' की बात करते हैं वे भी और जो 'बहुवचन' की बात नहीं करते हैं, वे भी शायद असहमति के प्रति आदर की इस संस्कृति को समझने की कोशिश नहीं करते। असहमति के प्रति आस्था और आदर की वजह से ही 'महाराजिन बुआ' शीर्षक कविता में पुरुषों के लिए आरक्षित और सुरक्षित श्मशान भूमि में एक विधवा स्त्री-
''चिताओं के बीच ऐसे टहल रही है
जैसे खिले पलाश वन में विचर रहो हो
एक औरत की तरह उसके भी आँचल में दूध था
और आँखों में भरपूर पानी
अबला थी
और भी अबला हो गयी होती विधवा बनकर
चाहती तो काशी की विधवाओं में बदल जाती
या चली जाती वृंदावन
पर वह चल पड़ी श्मशान की ओर।''
दो वर्ष पहले वृंदावन की विधवाओं की दयनीय स्थिति पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी जिन्हें याद हो वे समझ सकते हैं कि भारतीय नवजागरण की शुरूआत राजा राममोहन राय और पंडिता रमाबाई के जिस सामाजिक सुधार के एजेंडा से जुड़ी हुई है उसमें विधवा स्त्रियों का मुद्दा सबसे ऊपर क्यों था? राजा राममोहन राय को यह कहना पड़ा था कि जिस ब्रिटिश साम्राज्यवाद को वे आधुनिक मानकर  चल रहे थे वे भी इस प्रथा को बनाए रखने वालों के पक्ष में खड़े थे। उस समाजशास्त्र को भी याद करें जिसकी वजह से हिन्दी में स्त्रियों की आत्मकथा की शुरूआत भी विधवा स्त्रियों द्वारा होती है। ज्योतिबा फुले कहते थे कि जो सहता है वही जानता है। विधवा स्त्री की पीड़ा पर पिछले 150 वर्षों के भारतीय इतिहास में हम जहां से चलकर जहां पहुंचे हैं उसे जानने के लिए उच्चतम न्यायालय की वह टिप्पणी सिर्फ एक प्रमाण है। जिस देश में सरकार द्वारा चलाए जाने वाले विधवा आश्रम में स्त्रियों के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं हैं उस देश की प्रगति और उन्नति का आँकड़ा जुटाने की जरूरत नहीं हैं। शवों को काटकर बोरे में भरकर युमना में प्रवाहित करने की विवशता 21 वीं शताब्दी की है। शंकराचार्य को एक जमाने में यही काम अपनी माँ के अंतिम संस्कार के लिए करना पड़ा था।
'महाराजिन बुआ' कविता इस पृष्ठभूमि में एक विधवा स्त्री के चीत्कार की नहीं प्रतिकार की कविता है। इलाहाबाद के ही पथ पर पत्थर तोड़ती एक औरत ने निराला पैदा किया था। इसी इलाहाबाद के श्मशान पर 'महाराजिन बुआ' ने हरीशचन्द्र पैदा किया। बड़े दुख अपना कवि खुद खोज लेते हैं -
''खुद अपने मोक्ष के लिए छटपटाती एक नदी के तट के
तर्पणों का समुद्र सौंप रही है
पंडों के शहर में
मर्दों के पेशे को
मर्दों से छीनकर
जबड़े में शिकार दबाये-सी घूम रही है वह
अभी अभी
घाट पर भी मर्द बने आदमी को
उसी की गुप्तांग भाषा में लधेड़ा है उसने।''
महादेवी द्वारा रुपायित 'साहित्यकार संसद' की सीमा से पहले महाराजिन बुआ के श्मशान की सीमा समाप्त होती है जहाँ, कभी महादेवी द्वारा असीम और सीमा का भ्रम पहचाना गया होगा तो कभी उलझती हुई गंगा के सामने महाप्राण निराला ने बादल राग गाया होगा। इलाहाबाद जहां कविता के 'युगान्त' देखे जाते हैं और संगम पर युगों के युग्म पर जनता का विशाल युग्म उमड़ता है वहाँ दूर बजे एक ट्रांजिस्टर पर मेघ मलहार की आवाज से महाराजिन बुआ सशंकित हो उठती हैं-
''महाराजिन सशंकित हो ताकने लगती हैं आकाश
अधजली चिताएं उसे सोने नहीं देतीं रात भर
उसकी पसंद है दीपक राग।''
दीपक राग और विधवा जीवन का संबंध विचारणीय है। तानसेन की मृत्यु इसी दीपक राग के गायन से हुई थी। विधवा, श्मशान और दीपक राग की इसी त्रिवेणी पर -
''एक विधवा, दूसरी विधवा के शव को जलवाते हुए
अतीत में दबी अनन्त विधवाओं की
भयाचित चिताओं की चीखें सुन रही हैं।''
घर से श्मशान तक विस्तृत स्त्री दुखों के वृत्त में एक कविता माँ के देहावसान से संबंधित है। घर में माँ सदा-सदा के लिए श्मशान चली गयीं -
''वह अब नहीं आएगी वापस
ये हम पक्का कर आए थे नदी किनारे
उन पुस्तकों को प्रवाहित कर आए थे
जिन्हें उसने प्रवाहित करने को कहा था
पर उन्हें पढऩे की लय को नहीं बहा पाये हम...''
माँ के साथ पुस्तकों को प्रवाहित करने की प्रक्रिया में पढऩे की लय और उस रिक्तता की अनुभूति -
''नापना चाहता हूँ
रिक्तता को
जो एक माँ छोड़ जाती है
कोई नपना दे दो।''
तय है कि ऐसा नपना नहीं मिलेगा क्योंकि ऐसे नपने बनते ही कहाँ हैं? लेकिन वह रिक्तता आँगन में फूल रहे फूलों, कोपलों और पत्तों के जरिए बाहर से आए किसी मित्र को इस रूप में दिखायी पड़ती है -
''माँ आ गयी
और तुने मुझे बताया भी नहीं।''
एक छोटी सी चीज एक बड़ी कमी को पूरा नहीं कर सकती लेकिन एक उम्मीद है वह जिस पर यह दुनिया कायम है। गोरख पाण्डेय की कविता 'फूल और उम्मीद' याद आती है -
''यहीं पर
एक बूढ़ा माली
हमारे मृत्युग्रस्त सपनों में
फूल और उम्मीद
रख जाता है।''
मखदूम की वह मशहूर नम 'फूल खिलते रहेंगे दुनिया में' को याद कीजिए और मृत्यु के बरक्स फूल की कल्पना से अवसाद को दूर कीजिए। कबीर ने मृत शरीर को फूल की संज्ञा दी है। जायसी ने लिखा है 'फूल मरै पर मरै न बासू' फूल मर जाता है, सुगंध नहीं मरती है। कविता में जीवन देने की शक्ति भले ही न हो लेकिन मृत्यु को फूल कहने की शक्ति जरूर है।
जायसी ने संसार की निस्सारता के प्रतिपक्ष में मनुष्य के प्रेम की बात की थी। हरीशचंद्र जी की एक कविता है 'संसार'। ज्ञानियों ने इस संसार की व्याख्या की है। माक्र्स ने उसे बदलने की बात की थी। जाहिर है कि यह बदलाव इस संसार को निस्सार मानने वालों से संभव नहीं था। यथास्थितिवादियों ने जैसे दार्शनिक पैदा किए उन दार्शनिकों ने क्या किया उसका विश्लेषण हरीशचन्द्र जी की इस कविता में संक्षेप में मौजूद है। धरती को झूठ मानने वाले का जवाब चुपके से दे दिया है -
''नि:सार है संसार
ठहरे पाने में वृत्त की तरह फैलता है
एक बयान
बंजर जमीन
अपन बंजरपन पर नाज़ करने लगती है
लगभग ठीक उसी वक्त
एक शिशु
इस पृथ्वी पर अपनी पहली किलकारी मारता है।''
हरीशचन्द्र पाण्डेय की कविताओं में धरती पर गुरूत्वाकर्षण व्यापक और सघन है। इसका दीदार बहुतेरी कविताओं में होता है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण जैसे आकर्षक शब्दों के भ्रमजाल द्वारा पूंजीवाद ने जो नया अवतार लिया है उसकी फलश्रुति शहरों में मेगामार्ट के रूप में दिखाई पड़ रही है तो गाँवों में आत्महत्या के रूप में। हरीशचन्द्र जी बहुत स्पष्ट रूप से इस आत्महत्या को आत्महत्या न मानते हुए हत्या मानते हैं। हत्या को आत्महत्या में तब्दील करने की साजिश को बेनकाब करते हुए उन्होंने 'किसान और आत्महत्या' शीर्षक कविता का समापन ही इन शब्दों में किया है -
''कितना आसान है हत्या को आत्महत्या कहना
और दुर्नीति को नीति''
जिस आत्महत्या को नर्क का द्वार सुनते-सुनते वे सयाने हुए थे वे आत्महत्या  करने के लिए विवश हुए?
''क्या नर्क से भी बदतर हो गयी थी उसकी खेती
वे क्यों करते आत्महत्या
जीवन उनके लिए उसी तरह काम्य था
जिस तरह मुमुक्षुओं के लिए मोक्ष
लोकाचार उसमें नदियों की तरह प्रवाहमान सदानीरा
उन्हीं की हलों के फाल से
संस्कृति की लकीरें खिंची चली आयी थीं
उनका आत्म तो कपास की तरह उज्जर था
वे क्यों करते आत्महत्या''
भारत सरकार के आँकड़े बता रहे हैं कि 'उदारीकरण' की लगभग 20 वर्षीय अवधि में 2 लाख किसानों ने आत्महत्या का निर्णय लिया है। प्रेमचंद के कथा संसार में किसानों औैर मजदूरों को याद कीजिए और फिर उपनिवेशवाद और उत्तर उपनिवेशवादी विमर्श के आइने में इस समस्या पर विचार कीजिए। हम कहां जा रहे हैं? हमारे किसान-मजदूरों के पास न तो अब धैर्य है और न ही प्रतिरोध-प्रतिकार की शक्ति। पूंजीवाद सब कुछ कच्चा चबा गया और हम मुँह ताक रहे हैं। निश्चय ही स्थितियाँ बद से बदतर हुई हैं लेकिन हम बुद्धिवाद और सुविधावाद के दलदल में फंस गए हैं। कार्लमाक्र्स ने मजदूरों को बुद्धिजीवियों से सावधान रहने के लिए क्यों कहा था। अब इसका अर्थ ज्यादा खुल रहा है।
स्त्रियों को एक भरा पूरा संसार हरीशचन्द्र के काव्य लोक में मौजूद है। एक कविता में दो औरतें जाड़े की धूप से बातें करतीं साथ-साथ चली जा रही हैं। एक स्त्री की गोद में बच्चा है। कविता यहीं से शुरू होती है -
''जिसकी गोद में बच्चा है, वही माँ हो उस बच्चे की
जरूरी नहीं
चलते-चलते बातें करते-करते
भार बांट लिया जाये
और किसी को पता भी न चले
एक दूसरे को निर्भार किये जाने का
ये उनका अपना तरीका है।''
हरीशचन्द्र पाण्डेय समकालीन हिन्दी काव्य संसार में उन थोड़े कवियों में हैं जो अपने को दुहराने की हर संभावना से बचने की कोशिश करते हैं। यही नहीं उन्हें जीवन के उन अनन्त चिर परिचित दृश्यों में से कविता की संभावना पैदा करने में एक विशेष दक्षता हासिल है। उनके पिछले काव्य संग्रह 'भूमिकाएं खत्म नहीं होतीं' में एक कविता थी जिसमें एक तोते द्वारा फल खाने का दृश्य है। यह दृश्य कितना आम है लेकिन उसे खास बनाने की कला जिसे आए वही कवि बड़ा होता है। उस कविता में एक चोंच फल पर गिरता है और मिठास सीधे आत्मा तक पहुँचती है और इस मिठास के लिए स्वर्ग के देवता तड़पकर रह जाते हैं। इस संग्रह में 'आम और पत्तियाँ' कविता शामिल है। बिल्कुल सामान्य दृश्य लेकिन इन आम और पत्तियों का यह संवाद तो सुनिए -
''देशांतर बिकने को तैयार आम बतियाते हैं आपस में
हवा-हवा के खेल में कैसे हार जाती थी इससे पत्तियाँ
भालों से तार-तार हो कैसे बचाती थीं हमें
कैसे छूती थी हमारी ठुड्डियाँ बार-बार
ये रस में मिठास और कहां से पाया हमने।''
बिकना आम को है पत्तियों को नहीं, लेकिन जल्दी जल्दी के चक्कर में भटकर वे भी आम के साथ टूट आयी हैं। पत्तियाँ परिशिष्ट हैं या संदर्भ तय करना मुश्किल है पर,
''खरीदार की आँखों को ताजगी दे रही हैं पत्तियाँ
आमों को और भी कीमती बना रही हैं पत्तियाँ''
एक लड़की जिसे सड़क पर गोबर की तलाश है वह 'उसके भाग से' शीर्षक कविता में-
''वह खाली तसला लिये खड़ी थी सड़क किनारे
ये भैसों का ऊधर से गुजरने का समय था
इस समय जब राजधानी में एक ग्लोबल टेंडर खुलने ही वाला है
उसे समेटना है ताज़ा गोबर।''
'ग्लोबल टेंडर' से इस लड़की के भाग्य का रिश्ता तो देश के भाग्य विधाता जाने उसका भाग्य भैंसों के सड़क पर गोबर देने तक सीमित है। इसी काव्य संग्रह में एक सेवानिवृत्त पिता हैं जिन्हें पेंशन पाने के लिए हर साल 'लाइफ सर्टिफिकेट' की जरूरत होती है। आज उन्हें अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र जो लेना है। जीवन का यह प्रमाण पत्र आसन्न मृत्यु के सभी लक्षणों को छिपाकर पाना है इसलिए-
''वहां नहीं दिखानी है उन्हें अपने जर्जर किडनी
दिल के दौरे की रिपोर्ट भी नहीं
न शुगर की रिपोर्ट, न बी.पी. की
बस दिखाना है कि हम जीवित हैं।''
प्रमाण पत्रों से चलने वाले इस देश में जहां नागरिकता से लेकर गरीबी और मृत्यु के प्रमाण पत्रों को पाने में खून पसीना एक करना पड़ता हो उस देश में अपने को जीवित सिद्ध करने का प्रमाण पत्र किसी भी व्यक्ति के कितना अत्यावश्यक है इसकी कल्पना करने की जरूरत नहीं है। एक व्यक्ति को अपनी राष्ट्रीयता से लेकर जीवन को प्रमाणित करने की जद्दोजहद जिस राजनीतिक व्यवस्था में चल रही है उसका एक खूबसूरत नाम है 'प्रजातंत्र'। यदि ऐसे प्रजातंत्र में प्रजा का यह हाल है तो इस प्रजातंत्र को पुर्नपरिभाषित करना होगा। 'प्रजातंत्र' शीर्षक कविता में यह कार्य भी हुआ है -
''शीशे का एक जार टूटा है
एक हाथ छूटा है कोमलतम गाल पर अभी
चंचलता का कांचपन टूटा है
घर तो एक प्रजातंत्र का नाम था
बार-बार कहा गया था कि
जनता राज्य में ऐसे विचरे
जैसे पिता के घर में पुत्र
प्रजातंत्र टूटा
एक जार की तरह''

एरिक होब्सबव्स जब 20 वीं सदी के अतिरेकों और अंतर्विरोधों को समझने की कोशिश करते हुए आज से 20 वर्ष पहले 'द एज ऑफ एक्सट्रीमस' लिख रहे तब उन्होंने अपने समय के भिन्न भिन्न क्षेत्रों के यूरोपीय विशेषज्ञों की 20 वीं सदी के बारे में राय आमुख के रूप में प्रकाशित की थी। कुछ ने इसे मनुष्यता के ऊपर कलंक के रूप में देखा था तो कुछ लोगों की राय में यह शताब्दी इलेक्ट्रोनिक्स की उपलब्धियों के लिए याद किए जाने लायक थी। इन सबसे अलग इटली के एक मानवविज्ञानी का मानना था कि बीसवीं सदी इतिहास को समझने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयोगशाला सिद्ध हो सकती है। जाहिर है यह प्रयोगशाला ऐसी ही दीवारों से बनी है और इस प्रयोगशाला में प्रवेश के लिए 'असहमतियां' प्रवेश पत्र का काम करेंगी।

 


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